मेवाड़ की अंतिम सती: ऐंजाबाई
मेवाड़ के इतिहास में सती प्रथा का एक दुखद स्थान है। इस प्रथा के तहत विधवा महिलाओं ने अपने स्वर्गीय पति के साथ चिता में जलकर अपनी पतिव्रता का प्रदर्शन किया। ऐसी घटनाएँ राजपूत समाज में बहादुरी और त्याग की पराकाष्ठा मानी जाती थीं।
मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी पासवान ऐंजाबाई ने सती होने का फैसला किया। यह 1847 ईस्वी में हुई घटना थी। ऐंजाबाई की सती मेवाड़ के महाराणाओं के साथ हुई अंतिम सती थी। इसके बाद सती प्रथा को कानून द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया, और यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गई।
ऐंजाबाई की सती की घटना केवल इतिहास का एक पन्ना नहीं, बल्कि उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को दर्शाती है। आज भी उनकी स्मृति में बने स्मारक और चिताओं के अवशेष हमें उस युग की ओर ले जाते हैं, जब त्याग और वफादारी की परिभाषा बहुत अलग थी।
हालाँकि आज सती प्रथा को मानवाधिकार के दृष्टिकोण से देखा जाता है, लेकिन
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