सत्य को खींचना – यानी अतिशयोक्ति
कभी-कभी हम बातों को और रोचक बनाने के लिए थोड़ा बहुत ज्यादा ही कह देते हैं। ऐसा करना वैसे तो आम बात है, लेकिन इसके पीछे छिपा शब्द है – अतिशयोक्ति।
जब कोई व्यक्ति कहता है कि "मैंने आज सौ रोटियाँ खा लीं" या "ये बैग इतना भारी है कि मेरी कमर टूट गई", तो वह वास्तविकता को थोड़ा खींच रहा होता है। यही क्रिया है – exaggerate, यानी सत्य को लंबा कर देना।
अतिशयोक्ति करना हमेशा गलत नहीं होता। कई बार यह बातचीत में मज़ा डाल देती है, भावनाओं को उभारती है, या किसी बात पर ज़ोर देती है। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल बार-बार या उद्देश्यपूर्ण तौर पर किया जाए, तो विश्वास कम हो सकता है।
इसलिए जब भी आप सुनें कि कोई कह रहा है "मैं इतना डर गया कि मेरी आत्मा निकल गई", तो समझ जाइए – यहाँ सत्य को खींचा जा रहा है। और इसे कहते हैं – अतिशयोक्ति।
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