श्री कृष्ण का वृंदावन काल

श्री कृष्ण का बचपन वृंदावन में बिता, जहाँ उन्होंने लगभग 14 से 16 वर्ष तक रहकर अपने अद्भुत लीलाओं को दर्शाया। यह वह समय था जब वे गोप-गोपिकाओं के साथ रास रचाते, मखन चुराते और यमुना तट पर बंसी बजाते दिखाई देते थे।

वृंदावन में बिताए वर्ष उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दौर थे। इसी दौरान उन्होंने अपने चाचा कंस के भय से बचने के लिए नंदगाँव और वृंदावन में छिपकर जीवन बिताया। जब वे लगभग 15 वर्ष के थे, तब मथुरा जाकर उन्होंने कंस का वध किया, जो उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

कृष्ण के वृंदावन छोड़ने के बाद भी उनका संबंध वहाँ के लोगों से अटूट रहा। वे अपनी जैविक माता यशोदा और पिता नंद को वृंदावन में ही छोड़कर गए, लेकिन उनके प्रति अपना प्यार और सम्मान कभी नहीं भूले।

वृंदावन की धरती आज भी कृष्ण की लीलाओं की गूंज सुनाई देती है। उनके बचपन की क्रीड़ाएँ आज भी भक्तों के हृदय में जीवित हैं।

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