सुदामा और वो चने: एक भक्त की अटूट श्रद्धा
सुदामा जी की कथा भक्ति और मित्रता की अनमोल मिसाल है। जब वे अपने बालसखा श्री कृष्ण के दर्शन के लिए द्वारका गए, तो अत्यंत गरीबी में रहने के कारण कुछ भेंट में ले जाने को नहीं था। तब उनकी पत्नी ने कुछ चने बताए। यही चने उन्होंने गुरु माता के आदेश पर लेकर चल पड़े।
लेकिन रास्ते में सुदामा जी के मन में एक भय का भाव आया। उन्होंने सोचा कि अगर मैं ये चने श्री कृष्ण को दे दूं और वे खा लें, तो संपूर्ण सृष्टि दरिद्र हो जाएगी। क्योंकि भगवान कृष्ण जैसे भक्त की छोटी सी भेंट को भी अपनी कृपा से स्वीकार करते हैं, तो उसका फल सबको मिलता है। ऐसे में सुदामा ने सोचा, "मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जाएं—यह कैसे हो सकता है?"
इस डर और श्रद्धा के बीच सुदामा जी ने चनों को खुद ही खा लिया। यह कथा हमें सिखाती है कि भक्ति केवल भोग-प्रसाद नहीं, बल्कि हृदय की शुद्ध भावना से जुड़ी होती है। और भगवान कृष्ण ने बाद में सुदामा
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