सुदामा की छोटी पोटली, कृष्ण के प्रेम की महान गाथा

सुदामा और कृष्ण की मित्रता आज भी निस्वार्थ प्रेम की मिसाल है। जब सुदामा गरीबी में डूबे अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचे, तो उनके मन में लज्जा और संकोच था। वे अपनी दुर्दशा की बात कहने से हिचक रहे थे।

उनकी बगल में दबी हुई थी चावल की छोटी पोटली — वही उपहार जो उनकी पत्नी सुशीला ने प्यार से बांधकर भेजा था। कृष्ण, जो सब कुछ भांप चुके थे, मुस्काये और प्रेम से उस पोटली को मांगा। सुदामा संकोच में झिझक रहे थे, पर कृष्ण ने पोटली छीनकर उसमें से दो मुट्ठी चावल खा लिए।

यह छोटी सी घटना बड़ी है प्रेम की दृष्टि से। कृष्ण ने उस निर्धन उपहार को देवभोग बना दिया। चावल की गुड़िया में छिपा था स्नेह का अमूल्य रत्न। कहते हैं, उसी पल के बाद सुदामा के घर धन-धान्य की वर्षा हो गई।

इस कथा से सीख मिलती है — सच्चा प्रेम न तो धन पर टिका है, न दिखावे पर। वह तो छोटी सी पोटली में भी बस जाता है, बस चाहिए तो निष्कलंक भावना।

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