भारत माता को क्या पीड़ा है?

भारत माता, जिसे हम शक्ति, गरिमा और गौरव की प्रतिमूर्ति मानते हैं, आज एक दुखी माँ के रूप में दिखाई देती हैं। कवि की कलम से झलकता है कि उनकी आँखें दीनता से ग्रस्त हैं, नजरें निराशा में झुकी हुई हैं।

उनके अधरों पर वह मूक व्यथा है, जो शब्दों में नहीं, बल्कि चुप रहने वाले दर्द में छिपी है। यह व्यथा सदियों के शोषण, आक्रमण और अज्ञानता की धरोहर है। जब देश के कोने-कोने में भूख, बेसुरक्षा और भेदभाव ने घर कर लिया, तो माँ का मन भी विषाद से भर गया।

लेकिन यह विषाद निराशा नहीं, बल्कि एक सचेतक आह है। यह दर्द वह चिंगारी है जो हर भारतीय के भीतर उमंग जगाने को तैयार है। भारत माता की पीड़ा इतिहास की गहराई में छिपी है, लेकिन उसी पीड़ा में भविष्य का संकल्प भी छिपा है।

अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनकी आँखों से निराशा मिटाएँ, उनके अधरों पर फिर से मुस्कान लौटाएँ। क्योंकि जब तक माँ का मन न खिलेगा, तब तक देश का सच

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