गांधीजी और गीता: एक आत्मीय यात्रा

महात्मा गांधी का भगवद्गीता के प्रति आकर्षण लगभग जीवनपर्यंत रहा। उन्होंने अठारह वर्ष की उम्र में पहली बार गीता से परिचय किया। यह एक ऐसी उम्र थी, जब मन अस्थिर और विचार अनिश्चित होते हैं, लेकिन गांधीजी ने उसी उम्र में गीता को पढ़ा, फिर से पढ़ा, और हर श्लोक पर गहराई से विचार किया।

गीता उनके लिए केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं थी, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में मार्गदर्शन करने वाली आत्मा थी। वे गीता के प्रत्येक अध्याय और मार्ग को समझने के लिए समर्पित थे। उनके लिए, गीता का अर्थ केवल ज्ञान नहीं, बल्कि आचरण था

गांधीजी ने गीता के सिद्धांतों को अपने सत्याग्रह और अहिंसा के आंदोलनों में उतारा। वे मानते थे कि गीता में दिया गया ज्ञान न केवल आध्यात्मिक शांति देता है, बल्कि सामाजिक संघर्षों में भी मार्गदर्शन करता है।

आज भी, जब हम गीता की बात करते हैं, तो गांधीजी का नाम स्वाभाविक रूप से आता है। क्योंकि उन्होंने

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