गौतम अडानी की कंपनियों पर बढ़ता कर्ज और अर्थव्यवस्था से जुड़े सवाल
भारतीय उद्योग जगत में अडानी समूह का दबदबा किसी से छिपा नहीं है। लेकिन हाल के वर्षों में कंपनी के भारी-भरकम कर्ज को लेकर कई तरह की चिंताएं जताई गई हैं। आंकड़ों के अनुसार, अडानी समूह पर करीब 2.2 ट्रिलियन रुपये का कर्ज दर्ज किया गया, जो कि एक अकेला औद्योगिक समूह होने के नाते काफी बड़ा आंकड़ा है।
इस स्थिति की गंभीरता को ऐसे समझा जा सकता है कि जिस समय यह आंकड़ा सामने आया, उस दौरान भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 4.7 ट्रिलियन रुपये के करीब था। यानी अगर तुलना की जाए, तो एक अकेली कंपनी का कर्ज देश के कुल रिजर्व के लगभग 50 फीसदी के बराबर पहुंच गया था। आर्थिक विशेषज्ञों और विश्लेषकों के लिए यह आंकड़ा काफी हैरान करने वाला और संदेहास्पद रहा है।
किसी भी देश की वित्तीय स्थिरता के लिए यह जरूरी होता है कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों का जोखिम किसी एक कारोबारी घराने में केंद्रित न हो। जब किसी एक समूह पर इतना बड़ा कर्ज होता है, तो बैंकों के फंसे हुए कर्ज (NPA) का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, अडानी समूह का कहना है कि उनकी अधिकांश कंपनियां बुनियादी ढांचे (Infrastructure), ऊर्जा और बंदरगाह जैसे मजबूत क्षेत्रों में काम कर रही हैं, जिनसे लगातार राजस्व आता रहता है। इसके बावजूद, इतने बड़े पैमाने पर कर्ज का होना भारतीय बैंकिंग प्रणाली और बाजार की साख पर कई सवाल खड़े करता है।
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