अदालत में गीता पर हाथ रखकर कसम क्यों खाई जाती है?

अदालतों में गवाही के दौरान गीता पर हाथ रखकर कसम खाने की प्रथा कोई नई बात नहीं है। यह परंपरा मुगल काल से शुरू हुई, जब दरबारों में सच बोलने के लिए धार्मिक ग्रंथों पर हाथ रखकर शपथ ली जाती थी। उस समय इसके पीछे कोई कानूनी आधार नहीं था, बल्कि यह एक आस्था और ईमानदारी का प्रतीक था।

लेकिन अंग्रेजों के आते ही इस प्रथा को कानूनी रूप दिया गया। सन् 1873 में इंडियन ओथ्स एक्ट पारित किया गया, जिसके तहत सभी अदालतों में गवाहों से उनके धर्म के अनुसार शपथ लेना अनिवार्य कर दिया गया। हिंदू लोग भगवद गीता पर, मुस्लिम लोग कुरान पर और ईसाई लोग बाइबल पर हाथ रखकर सच बोलने की कसम खाते हैं।

आज भी यह प्रथा भारत की न्याय प्रणाली का एक हिस्सा है। गीता को चुने जाने का मतलब यह नहीं कि यह सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि इसके पीछे यह विश्वास है कि गवाह अपने सबसे पवित्र मान्यता के सामने सच बोलने की शपथ ले रहा है।

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