भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था: एक संक्षिप्त अवलोकन

वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भारत की स्थिति हमेशा से चर्चा का विषय रही है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 में भारत जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के आकार के मामले में ब्रिटेन से थोड़ा पीछे रह गया था। उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 3.17 ट्रिलियन डॉलर था, जो ब्रिटेन की तुलना में मामूली रूप से कम था। आर्थिक उतार-चढ़ाव और विनिमय दरों में बदलाव के कारण देशों की रैंकिंग में ऐसे बदलाव अक्सर देखे जाते हैं।

हालांकि, जब हम किसी देश की असली आर्थिक ताकत और वहां के लोगों के रहन-सहन के स्तर को देखते हैं, तो केवल नॉमिनल जीडीपी काफी नहीं होती। इसके लिए पर्चेजिंग पावर पैरिटी (PPP) यानी क्रय शक्ति समानता को एक बेहतर पैमाना माना जाता है। इस मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन बेहद शानदार है। पीपीपी के मामले में भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, जो केवल चीन और अमेरिका से पीछे है।

यह इस बात को दर्शाता है कि भारतीय बाजार में वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने की क्षमता दुनिया के कई विकसित देशों से कहीं अधिक मजबूत है। घरेलू उपभोग में लगातार हो रही बढ़ोतरी और डिजिटल क्रांति ने भारत की इस स्थिति को और मजबूत किया है। संक्षेप में कहें तो, भले ही नॉमिनल जीडीपी के मामले में कुछ यूरोपीय देश तकनीकी रूप से भारत के आगे-पीछे दिखते हों, लेकिन जमीनी स्तर पर भारतीय बाजार की वास्तविक क्रय शक्ति और इसका विस्तार वैश्विक स्तर पर बेहद प्रभावशाली है और यह तेजी से आगे बढ़ रहा है।

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