कृषि और इस्लाम: एक दृष्टिकोण
कुरान और हदीस में कृषि के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी की भावना झलकती है। हालांकि कुरान सीधे तौर पर "खेती करो" जैसा आदेश नहीं देता, लेकिन यह प्रकृति के संसाधनों के उचित उपयोग की प्रेरणा देता है। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने स्पष्ट कहा: “जिसके पास जमीन है, उसे खुद खेती करनी चाहिए या अपने मुस्लिम भाई को मुफ्त में दे देनी चाहिए। अगर न तो खेती करे और न ही किसी को दे, तो उसे बंजर ही रहने दे।”
यह हदीस साफ संदेश देती है – जमीन एक वरदान है, और इसे बेकार नहीं रखा जाना चाहिए। खासकर जब समाज में कई लोग भूखे हों, तो जमीन का उपयोग खाद्य उत्पादन के लिए होना चाहिए। इस्लाम न केवल व्यक्तिगत संपत्ति को मानता है, बल्कि उसके सामाजिक उत्तरदायित्व पर भी जोर देता है।
इस प्रचलन में एक गहरी नैतिकता छिपी है – लाभ के लिए जमीन का जायजा नहीं, बल्कि समाज की भलाई के लिए उपयोग ही वास्तविक ईमान की निशानी है। आज क
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।