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दुनियाभर के मुल्कों को अपने भारी-भरकम कर्ज के बोझ तले दबाने वाला चीन क्या भारत को भी अपने आर्थिक जाल में फंसा चुका है? आंकड़े बताते हैं कि सीधे तौर पर भारत सरकार ने बीजिंग से कोई बड़ा संप्रभु कर्ज (Sovereign Debt) नहीं लिया है। लेकिन रुकिए, तस्वीर इतनी भी साफ नहीं है। बहुपक्षीय बैंकों, चीनी वित्तीय संस्थानों और भारतीय कॉर्पोरेट्स के जरिए अरबों डॉलर का चीनी निवेश और अप्रत्यक्ष लोन हमारी अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो भारत पर चीन का सीधा सरकारी कर्ज शून्य के बराबर है, लेकिन कॉर्पोरेट और संस्थागत उधारी का मकड़जाल बेहद पेचीदा है।
आर्थिक निर्भरता और ड्रैगन के कर्ज की पृष्ठभूमि
वैश्विक आर्थिकी में चीन ने हमेशा एक चतुर साहूकार की भूमिका निभाई है। अमूमन जब हम किसी देश पर कर्ज की बात करते हैं, तो ध्यान बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) पर जाता है, जिसके जरिए पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे पड़ोसी कंगाल होने की कगार पर पहुंच गए। भारत ने शुरुआत से ही चीन की इस आक्रामक विस्तारवादी नीति का कड़ा विरोध किया और खुद को इससे दूर रखा। हालांकि, 1990 के दशक के उदारीकरण के बाद भारतीय बाजारों में चीनी सामानों की बाढ़ आ गई। व्यापार घाटा तेजी से बढ़ता गया, जिसने एक अलग तरह की आर्थिक निर्भरता को जन्म दिया। जब भारतीय कंपनियों को अपने विस्तार के लिए सस्ते और बड़े फंड की जरूरत पड़ी, तो चीनी बैंकों ने बेहद कम ब्याज दरों पर कर्ज की पेशकश शुरू की। यहीं से शुरू हुआ भारत में चीनी पूंजी का वह मूक प्रवेश, जो सीधे सरकारी बही-खातों में तो नहीं दिखता, लेकिन कॉर्पोरेट बैलेंस शीट पर गहरा असर डालता है।
कैसे काम करता है चीनी उधारी का यह पेचीदा तंत्र?
चीन भारत को सीधे पैसे उधार नहीं देता, बल्कि इसके लिए बेहद चालाकी से तीन मुख्य रास्तों का इस्तेमाल करता है। सबसे पहला जरिया है एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB)। भारत इस बहुपक्षीय विकास बैंक का एक संस्थापक सदस्य और दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक है। AIIB ने भारत में बुनियादी ढांचे, मेट्रो परियोजनाओं और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए अरबों डॉलर के लोन स्वीकृत किए हैं। चूंकि इस बैंक में चीन की हिस्सेदारी और वोटिंग पावर सबसे ज्यादा है, इसलिए इन लोन्स में चीनी वित्तीय दबदबा साफ झलकता है। दूसरा रास्ता है एक्सटर्नल कमर्शियल बरोइंग (ECB)। भारतीय निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां, खासकर पावर, टेलीकॉम और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की, चीनी बैंकों जैसे इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक ऑफ चाइना (ICBC) या चाइना डेवलपमेंट बैंक से सीधे तौर पर वाणिज्यिक कर्ज लेती हैं। तीसरा और सबसे छुपा हुआ तरीका है सप्लायर्स क्रेडिट। जब कोई भारतीय कंपनी चीन से भारी मशीनरी या तकनीकी उपकरण आयात करती है, तो चीनी कंपनियां उन्हें भुगतान के लिए लंबा समय या किश्तों पर सामान देती हैं, जो तकनीकी रूप से एक अल्पकालिक कर्ज ही है।
अनिल अंबानी की रिलायंस कम्युनिकेशंस: एक कड़वा सबक
चीनी कर्ज के जोखिम को समझने के लिए भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास का एक बड़ा उदाहरण देखना बेहद जरूरी है। साल 2010-12 के दौरान, अनिल अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCom) ने अपने टेलीकॉम नेटवर्क के विस्तार और चीनी कंपनियों (जैसे हुआवेई और जेडटीई) से उपकरण खरीदने के लिए चीनी बैंकों के एक सिंडिकेट से लगभग 1.3 अरब डॉलर का भारी-भरकम कर्ज लिया था। इस कर्जदाता समूह में चाइना डेवलपमेंट बैंक और आईसीबीसी जैसे सरकारी बैंक शामिल थे। जब आरकॉम का कारोबार बैठ गया और कंपनी दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गई, तब इन चीनी बैंकों ने भारतीय अदालतों से लेकर लंदन की अदालतों तक में अनिल अंबानी के खिलाफ आक्रामक कानूनी मोर्चा खोल दिया। इस मामले ने साफ कर दिया कि चीनी कर्ज भले ही निजी कंपनियों ने लिया हो, लेकिन डिफ़ॉल्ट की स्थिति में चीनी वित्तीय संस्थान बेहद आक्रामक और रणनीतिक रूप से दबाव बनाने की नीति अपनाते हैं, जो देश की साख को प्रभावित करती है।
विशेषज्ञों की क्या राय है?
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि चीनी कर्ज का जाल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि गहरे रणनीतिक हितों से प्रेरित है। विशेषज्ञों के अनुसार, चीन अक्सर विकासशील देशों को उनकी रीपेमेंट क्षमता से अधिक कर्ज देता है। जब ये देश कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाते हैं, तो चीन उनकी संप्रभुता और प्रमुख संपत्तियों (जैसे बंदरगाह और एयरपोर्ट) पर नियंत्रण हासिल कर लेता है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत के पड़ोस में श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह और पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि पारदर्शिता की कमी और अत्यधिक छिपी हुई ब्याज दरें इस कर्ज को और अधिक खतरनाक बनाती हैं। भारत के दृष्टिकोण से, रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि पड़ोसियों का चीनी कर्ज में डूबना भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिरता के लिए एक बड़ा सीधा खतरा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: क्या भारत सरकार ने सीधे तौर पर चीन से भारी कर्ज लिया हुआ है?
उत्तर: नहीं, भारत ने चीन सरकार से सीधे तौर पर (bilateral loan) कोई बड़ा कर्ज नहीं लिया है। भारत अपनी विकास परियोजनाओं के लिए मुख्य रूप से विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक (ADB) और बहुपक्षीय संस्थानों से कर्ज लेता है। हालांकि, भारत उस एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB) का सदस्य और दूसरा सबसे बड़ा शेयरधारक है, जिसमें चीन की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। इसलिए, संस्थान के माध्यम से आने वाले फंड को सीधे तौर पर चीन का कर्ज नहीं माना जा सकता।
प्रश्न 2: चीन का 'डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी' (कर्ज के जाल की नीति) क्या है?
उत्तर: 'डेट-ट्रैप डिप्लोमेसी' चीन की वह रणनीति है जिसके तहत वह गरीब या विकासशील देशों को बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए भारी-भरकम और महंगी शर्तों पर कर्ज देता है। जब कर्जदार देश समय पर भुगतान करने में विफल रहता है, तो चीन कर्ज माफी या रीशेड्यूलिंग के बदले उस देश के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों या भूभागों को 99 साल जैसी लंबी लीज पर ले लेता है, जिससे उस देश की राजनीतिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
एक बड़ा सवाल
सोचने वाली बात यह है कि क्या विकासशील देश चीनी निवेश के इस आकर्षक लेकिन खतरनाक चक्रव्यूह को समय रहते समझ पाएंगे, या फिर वे जाने-अनजाने में अपनी आने वाली पीढ़ियों की संप्रभुता को एक नए आर्थिक उपनिवेशवाद के हाथों गिरवी रख रहे हैं?
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