श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी का विवाह: प्रेम और समर्पण की अमर गाथा

दवापर युग की सबसे पवित्र और रोमांचक प्रेम कहानियों में से एक श्री कृष्ण और देवी रुक्मिणी का विवाह है। हिंदू पंचांग के अनुसार, भगवान कृष्ण और माता रुक्मिणी का विवाह वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हुआ था। इस विशेष दिन को आज भी सनातन धर्म में बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

रुक्मिणी विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री थीं और मन ही मन श्री कृष्ण को अपना सर्वस्व मान चुकी थीं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रुक्मिणी के भाई रुक्मी उनका विवाह कृष्ण के बजाय शिशुपाल से कराना चाहते थे। जब विवाह का दिन नजदीक आया, तो रुक्मिणी ने एक ब्राह्मण के हाथ श्री कृष्ण को एक प्रेम पत्र (संदेश) भेजा। इस पत्र में उन्होंने कृष्ण के प्रति अपने अगाध प्रेम को प्रकट किया और उनसे खुद को ले जाने की विनती की।

अपने भक्त की पुकार सुनकर द्वारकाधीश श्री कृष्ण विवाह से ठीक पहले विदर्भ नगरी पहुंचे। जब रुक्मिणी मंदिर में पूजा करके बाहर निकल रही थीं, तब कृष्ण उन्हें अपने रथ पर बैठाकर ले गए। इसके बाद माधवपुर (गुजरात) में दोनों का पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य विवाह संपन्न हुआ। आज भी माधवपुर में हर साल इस विवाह की याद में एक बहुत बड़ा मेला लगता है, जो उत्तर-पूर्व और पश्चिमी भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। यह विवाह केवल दो आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि अनन्य भक्ति और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की जीत है।

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