सनातन धर्म में श्री विष्णु और भगवान श्री कृष्ण का संबंध
सनातन परंपरा में भगवान विष्णु और भगवान श्री कृष्ण का संबंध अत्यंत गहरा और श्रद्धापूर्ण है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दोनों को एक ही परम दिव्य चेतना का रूप माना जाता है, परंतु लौकिक लीला और स्वरूप के स्तर पर इनमें कुछ महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देते हैं। भगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार और त्रिदेवों में से एक हैं, जो अनंत क्षीर सागर में निवास करते हैं। वे अजन्मे हैं और उनका प्राकट्य किसी गर्भ से नहीं हुआ है।
इसके विपरीत, श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का ही पूर्ण अवतार माना जाता है। द्वापर युग में अधर्म का नाश करने के लिए उन्होंने धरती पर माता देवकी और पिता वासुदेव के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। विष्णु जहाँ ब्रह्मांडीय व्यवस्था के स्वामी के रूप में शांत और गरिमामय हैं, वहीं कृष्ण ने मानव रूप में जन्म लेकर धरती पर अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायक लीलाएं कीं। उन्होंने द्वारका नगरी की स्थापना की और महाभारत के युद्ध में गीता का अमर संदेश दिया। एक मानव अवतार के रूप में उन्होंने संसार के नियमों का पालन किया और अपनी लीला समाप्त कर वैकुंठ लौट गए।
संक्षेप में कहें तो, तत्व रूप में कृष्ण और विष्णु एक ही हैं। अंतर केवल इतना है कि विष्णु मूल चेतना हैं और कृष्ण उसी परम सत्ता का लोक-कल्याण के लिए पृथ्वी पर लिया गया साकार और पूर्ण रूप हैं।
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