क्या चीन भारत का मित्र है? भारत-चीन संबंधों का बदलता स्वरूप
भारत और चीन के बीच के रिश्ते हमेशा से ही बेहद जटिल और संवेदनशील रहे हैं। 1962 के युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच लंबे समय तक अविश्वास का माहौल रहा। हालाँकि, 1980 के दशक के उत्तरार्ध से, दोनों देशों ने राजनयिक और आर्थिक संबंधों का सफलतापूर्वक पुनर्निर्माण किया है। इस सुधार ने दोनों एशियाई महाशक्तियों के बीच बातचीत के नए रास्ते खोले।
आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों के संबंध काफी मजबूत हुए हैं। 2008 से, चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है और दोनों देशों के बाजारों की एक-दूसरे पर निर्भरता काफी बढ़ी है। व्यापार के साथ-साथ, दोनों देशों ने अपने रणनीतिक और सैन्य संबंधों को भी बढ़ाया है, ताकि सीमा पर शांति और स्थिरता बनी रहे। वैश्विक मंचों जैसे BRICS और SCO में भी दोनों देश मिलकर काम करते हैं।
लेकिन क्या इन्हें पूरी तरह से 'मित्र' कहा जा सकता है? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। सीमा पर हाल के वर्षों में हुए विवाद (जैसे गलवान घाटी की घटना) और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा यह दर्शाती है कि इन दोनों देशों के बीच सहयोग और तनाव साथ-साथ चलते हैं। संक्षेप में कहें तो, भारत और चीन के रिश्ते केवल दोस्ती या दुश्मनी के तराजू में नहीं तोले जा सकते; यह 'प्रतिस्पर्धा और सहयोग' (Coopetition) का एक मिलाजुला रूप है, जहाँ आर्थिक लाभ के लिए सहयोग जरूरी है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है।
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