भारतीय संगीत में थाट और राग का संबंध

भारतीय शास्त्रीय संगीत में थाट (या ठाट) का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। सरल शब्दों में कहें तो थाट स्वरों का वह ढांचा या समूह है, जिससे अलग-अलग रागों का जन्म होता है। संगीत में सात क्रमिक स्वरों—सा, रे, ग, म, प, ध, नि—के शुद्ध, कोमल और तीव्र रूपों को मिलाकर थाटों का वर्गीकरण किया जाता है।

थाट की पहचान और नामकरण को सरल बनाने के लिए एक विशेष नियम अपनाया गया। जिस 7 स्वरों के समूह से जो मुख्य राग बना, उस थाट का नाम भी उसी प्रसिद्ध राग के अनुसार रख दिया गया। उदाहरण के लिए, जब सा, रे, ग, म, प, ध, नि—ये सभी सात स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं, तो उससे बिलावल राग की रचना होती है। इसी बिलावल राग के स्वर ढाँचे के आधार पर इस थाट को बिलावल थाट नाम दिया गया।

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत पद्धति में पंडित भातखंडे जी के अनुसार मुख्य रूप से 10 थाट माने गए हैं, जैसे कल्याण, खमाज, भैरव और असावरी। थाट को सीधे गाया या बजाया नहीं जाता, बल्कि यह रागों को समझने और उन्हें एक व्यवस्था में बांधने का काम करता है।

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