प्रेगनेंसी में रोने और मानसिक तनाव का शिशु पर असर
गर्भावस्था हर महिला के जीवन का एक बेहद खूबसूरत और संवेदनशील पड़ाव होता है। इस दौरान शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलावों के कारण मूड स्विंग्स होना और कभी-कभी रोना आना एक सामान्य बात है। सामान्य तौर पर, कभी-कभार रोने या उदास होने से गर्भस्थ शिशु पर कोई सीधा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।
हालांकि, समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह उदासी गंभीर रूप ले लेती है। यदि एक गर्भवती महिला लगातार अत्यधिक तनाव, चिंता (एंजायटी) या डिप्रेशन (अवसाद) से घिरी रहती है, तो इसका असर उसके होने वाले बच्चे पर पड़ सकता है। चिकित्सा शोधों और अध्ययनों के अनुसार, प्रेगनेंसी के दौरान लंबे समय तक मानसिक अस्वस्थता रहने से शरीर में तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन्स का स्तर बढ़ जाता है।
इस अत्यधिक मानसिक तनाव के कारण प्रीटर्म बर्थ (समय से पहले जन्म) और शिशु का लो बर्थ वेट (कम वजन) होने का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है। इसलिए, यह बेहद जरूरी है कि गर्भावस्था में मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए। गर्भवती महिलाओं को अपने परिवार से खुलकर बात करनी चाहिए, खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी संकोच के डॉक्टर या थेरेपिस्ट की सलाह लेनी चाहिए।
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