प्रेम विवाह का योग कैसे बनता है?

प्रेम विवाह आज के समय में न सिर्फ एक सामाजिक घटना है, बल्कि ज्योतिष के अनुसार यह कुंडली में बने कुछ विशेष योगों का भी परिणाम हो सकता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, विवाह का प्रमुख भाव सप्तम स्थान होता है और इसके स्वामी को सप्तमेश कहा जाता है। दूसरी ओर, प्रेम, रोमांस और मनोरंजन का स्थान पंचम भाव माना जाता है, जिसके स्वामी को पंचमेश कहते हैं।

जब कुंडली में सप्तमेश (विवाह के स्वामी) का संबंध पंचमेश (प्रेम के स्वामी) से तीसरे, पांचवें, सातवें, ग्यारहवें या बारहवें भाव में होता है, तो इसे प्रेम विवाह का योग माना जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति का हृदय प्रेम से भरा होता है और वह अपनी पसंद की व्यक्ति से शादी करने के लिए प्रेरित होता है।

इसके अलावा, शुक्र और चंद्र की स्थिति भी प्रेम विवाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि शुक्र पंचम या सप्तम भाव में मजबूत हो, तो व्यक्ति भावनाओं के आधार पर विवाह के लिए अधिक

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