बिहार पर बढ़ता कर्ज का बोझ
बिहार में विकास और प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार को लगातार वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। राज्य सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2021 तक बिहार सरकार का कुल कर्ज बढ़कर 2,27,195 करोड़ रुपए हो गया है। अगर इसकी तुलना पिछले वर्ष से की जाए, तो मार्च 2020 की तुलना में इसमें 36,297 करोड़ रुपए का बड़ा इजाफा देखने को मिला है।
राज्य के इस कुल कर्ज का सीधा असर यहां के आम नागरिकों पर पड़ता है। बिहार की अनुमानित आबादी के हिसाब से देखा जाए, तो आज राज्य का हर नागरिक औसतन 18,000 से 19,000 रुपए के व्यक्तिगत कर्ज के नीचे दबा हुआ है। हालांकि, यह कर्ज सीधे तौर पर किसी नागरिक को चुकाना नहीं होता, लेकिन सरकार द्वारा ली गई इस उधारी का भुगतान जन-कल्याणकारी योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे पर होने वाले खर्चों से ही समायोजित किया जाता है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बुनियादी ढांचे जैसे सड़क, पुल और बिजली के विकास के लिए कर्ज लेना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जब कर्ज का यह आंकड़ा लगातार बढ़ता है, तो राज्य के राजस्व घाटे पर भी दबाव बनने लगता है। बिहार जैसे विकासशील राज्य के लिए आने वाले समय में वित्तीय संतुलन बनाए रखना और कर्ज के इस बढ़ते बोझ को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती होगी।
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