'तीसरी दुनिया' और भारत की बदलती पहचान

शीत युद्ध के दौर में 'तीसरी दुनिया' शब्द का इस्तेमाल मूल रूप से उन देशों के लिए किया जाता था जो न तो पश्चिमी गुट (पहली दुनिया) का हिस्सा थे और न ही सोवियत संघ के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट गुट (दूसरी दुनिया) में शामिल थे। भारत ने इस दौरान गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, जिसके कारण ऐतिहासिक रूप से इसे तीसरी दुनिया का देश माना गया।

धीरे-धीरे इस शब्द का अर्थ बदल गया और इसे आर्थिक रूप से कमजोर, कम विकसित और गैर-औद्योगिक देशों के साथ जोड़कर देखा जाने लगा। यह एक ऐसी रूढ़िवादिता बन गई जिसके तहत हर विकासशील देश को तीसरी दुनिया कहा जाने लगा। हालांकि, इस परिभाषा में ब्राजील, चीन और भारत जैसे उन देशों को भी शामिल किया जाता रहा है जो तेजी से औद्योगिक विकास की राह पर आगे बढ़े।

आज के आधुनिक वैश्विक परिदृश्य में भारत को 'तीसरी दुनिया' का देश कहना पुरानी सोच को दर्शाता है। वर्तमान में भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति के रूप में देखा जाता है। तकनीकी विकास, अंतरिक्ष अनुसंधान, और मजबूत विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षमता के कारण अब भारत को एक नया औद्योगिक देश (NIC) और विकास का मुख्य केंद्र माना जाता है, जिसने पुरानी रूढ़ियों को पीछे छोड़ दिया है।

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