भारत में विदेशी निवासी: एक ऐतिहासिक और आधुनिक झलक

सदियों से भारत अपनी समृद्ध संस्कृति, विविधता और आर्थिक अवसरों के कारण दुनिया भर के लोगों को आकर्षित करता रहा है। ऐतिहासिक रूप से देखें तो व्यापार, ज्ञान की खोज और शरण की तलाश में विभिन्न देशों के लोग यहाँ आते रहे हैं और यहीं के होकर रह गए। आधुनिक दौर में भी यह सिलसिला थमा नहीं है। एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2020 तक भारत में लगभग 4.9 मिलियन (49 लाख) विदेशी मूल के निवासी रह रहे थे।

यह आंकड़ा अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों के मामले में भारत को वैश्विक स्तर पर 14वां सबसे बड़ा गंतव्य देश बनाता है। यह तथ्य दर्शाता है कि अपनी विशाल सीमाओं और विविध समाज के साथ भारत आज भी प्रवासियों के लिए एक पसंदीदा स्थान बना हुआ है। इनमें से अधिकांश लोग पड़ोसी देशों से हैं, जो रोजगार, पारिवारिक संबंधों या बेहतर जीवन स्तर की तलाश में यहाँ आए हैं। इसके अलावा, पश्चिमी और एशियाई देशों के कामकाजी पेशेवर भी भारत के बढ़ते तकनीकी और व्यापारिक क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं।

हालांकि, जब हम इस संख्या की तुलना भारत की विशाल आबादी से करते हैं, तो एक अलग तस्वीर सामने आती है। लगभग 1.4 बिलियन (140 करोड़) से अधिक की आबादी वाले इस देश में प्रवासियों की यह संख्या कुल जनसंख्या के 0.4 प्रतिशत से भी कम है। इसका सीधा मतलब यह है कि विदेशी मूल के लोगों की संख्या लाखों में होने के बावजूद, भारत की मूल जनसांख्यिकी पर इसका अनुपात बेहद सीमित है।

संक्षेप में कहें तो, भारत में रहने वाले विदेशी निवासी यहाँ की संस्कृति में एक नया रंग जोड़ते हैं। भले ही आबादी के प्रतिशत के रूप में उनकी हिस्सेदारी बहुत छोटी हो, लेकिन 'वसुधैव कुटुंबकम' यानी पूरी दुनिया को एक परिवार मानने की भारतीय परंपरा को यह संख्या पूरी तरह चरितार्थ करती है।

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