भारत के राज्यों पर बढ़ता कर्ज का बोझ

भारत के कई आर्थिक रूप से मजबूत और अग्रणी राज्य इस समय भारी कर्ज के संकट से जूझ रहे हैं। विकास कार्यों, बुनियादी ढांचे के निर्माण और सामाजिक कल्याण योजनाओं को चलाने के लिए राज्य सरकारों को अक्सर कर्ज का सहारा लेना पड़ता है। हालांकि, यह कर्ज जब एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है, तो राज्य की वित्तीय स्थिरता के लिए चिंता का विषय बन जाता है।

भारत सरकार के व्यय विभाग के आंकड़ों के अनुसार, देश के सबसे समृद्ध राज्यों में शामिल तमिलनाडु पर सबसे अधिक 6.6 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। इस सूची में दूसरा बड़ा नाम महाराष्ट्र का है, जिस पर 6 लाख करोड़ रुपए का बकाया है। औद्योगिक और आर्थिक रूप से आगे रहने वाले राज्यों का यह हाल दर्शाता है कि विकास की गति बनाए रखने की कीमत काफी भारी पड़ रही है।

अन्य प्रमुख राज्यों की स्थिति भी बहुत अलग नहीं है। पश्चिम बंगाल पर 5.6 लाख करोड़ रुपए, राजस्थान पर 4.7 लाख करोड़ रुपए और पंजाब पर 3 लाख करोड़ रुपए का वित्तीय बोझ है। विशेष रूप से पंजाब जैसे राज्यों में कर्ज और राज्य की कुल जीडीपी का अनुपात काफी चिंताजनक माना जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों को अपने राजस्व के स्रोत बढ़ाने और गैर-जरूरी खर्चों पर लगाम लगाने की सख्त जरूरत है। अगर समय रहते वित्तीय अनुशासन नहीं अपनाया गया, तो आने वाले समय में कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों के लिए बजट जुटाना बेहद कठिन हो सकता है।

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