इस्लाम में माँ का विशेष दर्जा और सम्मान

किसी भी समाज और धर्म में माता-पिता का स्थान सर्वोपरि माना गया है, लेकिन इस्लाम में माँ के प्रति सम्मान और सेवा को एक असाधारण दर्जा दिया गया है। माँ का त्याग, प्रेम और निस्वार्थ समर्पण ही वह धुरी है जिस पर एक सुंदर परिवार और बेहतर इंसान का निर्माण होता है।

मुसलमानों के पवित्र धर्मग्रंथ कुरान में ईश्वर (अल्लाह) ने माता-पिता के प्रति भलाई और आदर का स्पष्ट आदेश दिया है। सूरह लुकमान (31:14) में ईश्वर फरमाता है: "हमने इंसान को उसके माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करने का हुक्म दिया है। उसकी माँ ने उसे कष्ट पर कष्ट सहकर अपने गर्भ में रखा, और उसकी दूध छुड़ाई दो साल में हुई। मेरा और अपने माता-पिता का शुक्रिया अदा करो - अंततः सब मेरे ही पास लौट कर आएंगे।"

यह आयत स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ईश्वर की इबादत से गहराई से जुड़ा हुआ है। गर्भावस्था की तकलीफों से लेकर बच्चे का लालन-पालन और दूध पिलाने तक, माँ जितने कष्ट उठाती है, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। यही कारण है कि इस्लामिक शिक्षाओं में पिता से भी पहले और अधिक अधिकार माँ को दिया गया है।

एक प्रसिद्ध संदर्भ में जब पैगंबर मोहम्मद से पूछा गया कि इस दुनिया में सबसे अच्छे व्यवहार का हकदार कौन है, तो उन्होंने लगातार तीन बार उत्तर दिया: "आपकी माँ", और चौथी बार में पिता का नाम लिया। यह सिखाता है कि माँ की सेवा ही इंसान के लिए स्वर्ग का मार्ग खोलती है।

संक्षेप में, माँ की सेवा केवल एक सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि एक अत्यंत पवित्र धार्मिक कर्तव्य है। माँ की निस्वार्थ ममता और उसके त्याग का सम्मान करना ही सच्चे मायनों में मानवता और आस्था की पहचान है।

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