भारतीय संगीत में राग-रागिनी वर्गीकरण की परंपरा

भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग-रागिनी पद्धति का एक विशेष और प्राचीन इतिहास रहा है। पुराने समय में संगीत को समझने और उसके वर्गीकरण के लिए रागों को पुरुषों और रागिनियों को उनकी स्त्रियों के रूप में देखा जाता था। इस अनूठी प्रणाली में मुख्य रागों के साथ-साथ उनकी रागिनियों, पुत्रों और पुत्रवधुओं की भी कल्पना की गई थी।

शास्त्रीय संगीत के आचार्यों और विद्वानों के अनुसार राग-रागिनी वर्गीकरण के मुख्य रूप से चार प्रमुख मत माने जाते हैं। इनमें से प्रत्येक मत में रागों की संख्या और उनके स्वरूप को लेकर अपने अलग-अलग सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं।

इन चार दृष्टिकोणों में शिव अथवा सोमेश्वर मत अत्यंत प्रसिद्ध और प्राचीन माना जाता है। इस मत के अनुसार संगीत में मुख्य रूप से छः प्रमुख राग स्वीकार किए गए हैं: श्री, बसन्त, पंचम, भैरव, मेघ और नट नारायण। सोमेश्वर मत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक मुख्य राग की 6-6 रागिनियाँ मानी गई हैं। इस तरह इस मत के तहत कुल 36 रागिनियों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

समय के साथ संगीत के इस पारिवारिक वर्गीकरण की जगह आधुनिक थाट पद्धति ने ले ली, जिसे पंडित भातखंडे जी ने सरल और वैज्ञानिक बनाया। फिर भी, भारतीय संगीत के समृद्ध इतिहास को गहराई से समझने के लिए राग-रागिनी परंपरा का अध्ययन आज भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

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