महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा कर्ण और उनका राधा जी से संबंध
महाभारत का नाम आते ही कई वीर योद्धाओं और उनकी कहानियों का जिक्र छिड़ जाता है, जिनमें कर्ण का स्थान सबसे खास माना जाता है। कर्ण अपनी दानशीलता, अटूट मित्रता और असाधारण वीरता के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। उनके जन्म से जुड़ी कथाएं बहुत प्रसिद्ध हैं, लेकिन उनके लालन-पालन को लेकर एक ऐसा नाम जुड़ा है जो इतिहास में अमर हो गया है, और वह नाम है राधा जी।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कर्ण का जन्म कुंती के गर्भ से सूर्य देव के आशीर्वाद से हुआ था। कुंती ने लोक-लज्जा के डर से नवजात शिशु को एक बक्से में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया था। वह बक्सा बहते हुए सूत राजा धृतराष्ट्र के सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा को मिला।
अधिरथ और राधा जी की कोई अपनी संतान नहीं थी, इसलिए उन्होंने कर्ण को अपने ही बच्चे की तरह बहुत लाड़-प्यार और स्नेह के साथ पाला-पोसा। मां राधा ने उन्हें एक मां का आंचल और सही संस्कार दिए। यही कारण है कि इतिहास में कर्ण को सूतपुत्र के साथ-साथ राधेय यानी राधा का पुत्र के नाम से भी पुकारा गया। कर्ण अपनी माता राधा का बहुत सम्मान करते थे और आजीवन उन्हें अपनी असली मां का दर्जा दिया।
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