राधे-राधे कहने के पीछे की पौराणिक और आध्यात्मिक कथा
सनातन संस्कृति और विशेषकर ब्रज क्षेत्र में 'राधे-राधे' कहना केवल एक अभिवादन नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम की गहरी अभिव्यक्ति है। मान्यता है कि जब भगवान श्री कृष्ण ब्रज छोड़कर जाने लगे, तब वे अपनी प्रिय बांसुरी राधा रानी को सौंप गए थे। उनके जाने के विरह में डूबीं राधा जी ने श्री कृष्ण का रूप धारण कर लिया। उन्होंने अपने मस्तक पर मोर पंख सजाया और पीतांबरी वस्त्र पहनकर पूरे ब्रज में विचरण करना शुरू कर दिया।
ब्रज के निवासी भली-भांति जानते थे कि श्री कृष्ण के इस मनमोहक वेश में साक्षात उनकी लाडली राधा रानी ही घूम रही हैं। उनके प्रति इसी अगाध श्रद्धा और प्रेम के कारण ब्रजवासी उन्हें 'हे राधे-हे राधे' कहकर पुकारने लगे। समय के साथ यह पुकार हर भक्त के दिल की आवाज बन गई और आज भी ब्रज की गलियों से लेकर पूरी दुनिया में लोग एक-दूसरे को देखकर बड़े प्रेम से 'राधे-राधे' कहते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो राधा और कृष्ण कोई दो अलग अस्तित्व नहीं हैं, बल्कि वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कृष्ण यदि आत्मा हैं, तो राधा उस आत्मा का स्वरूप हैं। यही कारण है कि राधा रानी के नाम का जाप करने से भगवान श्री कृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सहज ही उनका सानिध्य प्राप्त हो जाता है। ब्रज में आज भी यह माना जाता है कि कृष्ण तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग राधा नाम की ओट लेना ही है।
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