विष्णु और देवी लक्ष्मी का विवाह: एक दिव्य कथा
हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विवाह सृष्टि की सबसे पवित्र और सुंदर घटनाओं में से एक है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि लक्ष्मी जी का विवाह भगवान विष्णु से कब और कैसे हुआ था? इस पावन प्रसंग की शुरुआत समुद्र मंथन के दौरान हुई थी।
जब देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन चल रहा था, तब उस क्षीर सागर से चौदह दिव्य रत्न निकले। इन्हीं रत्नों में से एक साक्षात देवी लक्ष्मी थीं। माता लक्ष्मी के प्रकट होते ही उनके दिव्य रूप और तेज को देखकर देवता और असुर दोनों ही उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करने लगे। इसके बाद देवी लक्ष्मी के विवाह के लिए एक भव्य स्वयंवर का आयोजन किया गया।
इस स्वयंवर में सभी देवता, असुर और ब्रह्मांड के प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे, जो यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि लक्ष्मी जी उनमें से किसी एक को चुनेंगी। इसी दौरान भगवान विष्णु भी उस सभा में एक संभावित वर के रूप में शामिल हुए। जैसे ही देवी लक्ष्मी की दृष्टि भगवान विष्णु पर पड़ी, वे उनकी दिव्यता और शांत स्वरूप की ओर आकर्षित हो गईं।
बिना किसी संकोच के, माता लक्ष्मी भगवान विष्णु की ओर बढ़ीं और अपने हाथों में ली हुई जयमाला उनके गले में डाल दी। इस प्रकार, माता लक्ष्मी ने स्वयंवर में भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना। यह विवाह केवल दो दिव्य शक्तियों का मिलन नहीं था, बल्कि यह सृष्टि के संतुलन, समृद्धि और नारायण की चेतना के एक होने का प्रतीक था। तभी से वे दोनों बैकुंठ धाम में एक साथ निवास करते हैं और सृष्टि का पालन करते हैं।
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