शत्रु को कभी छोटा या कमजोर क्यों नहीं समझना चाहिए?
जीवन में अक्सर हम कुछ चीजों को बहुत सामान्य या छोटा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यही भूल बाद में भारी पड़ सकती है। नीति शास्त्र और हमारे प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को कभी भी छोटा या कमजोर नहीं आंकना चाहिए। रामायण में भी जब शूर्पणखा का अपमान हुआ, तब उसने रावण को इसी बात की याद दिलाते हुए विलाप किया था कि किसी भी विरोधी को कम आंकना विनाश का कारण बन सकता है।
दुश्मन चाहे आकार, साधन या शक्ति में कितना भी छोटा क्यों न हो, उससे हमेशा सावधान और सतर्क रहना जरूरी है। इतिहास गवाह है कि जब कोई राजा या व्यक्ति अपने प्रतिद्वंद्वी को कमजोर मानकर लापरवाही बरतता है, तो उसे हार का सामना करना पड़ता है। एक छोटा सा तिनका भी अगर आंख में चला जाए तो गहरी पीड़ा देता है, और एक छोटी सी चिंगारी पूरे जंगल को राख कर सकती है।
ठीक इसी तरह, एक छोटा शत्रु भी सही समय और सही मौके का इंतजार करता है। वह गुप्त रूप से आपकी कमजोरियों पर वार कर सकता है। कई बार ये छोटे लगने वाले विरोधी ऐसा बड़ा नुकसान कर देते हैं, जिसकी भरपाई करना नामुमकिन हो जाता है और इंसान के पास सिर्फ पछतावा ही बचता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि कभी भी किसी को कमजोर न समझें और अपनी सुरक्षा व रणनीति को हमेशा मजबूत रखें।
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