श्री कृष्ण के बैकुंठ गमन के बाद की हृदयविदारक घटनाएं
सनातन परंपरा में श्री कृष्ण का महाप्रयाण एक अत्यंत संवेदनशील और युगांतकारी घटना माना जाता है। उनके इस धरा धाम को छोड़ने के बाद द्वारिका और उनके प्रियजनों पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। भगवान कृष्ण के जाने के विरह को न सह पाने के कारण उनकी पटरानियों, माता रुक्मिणी और जांबवती ने भी अपनी देह का त्याग कर दिया। केवल वही नहीं, बल्कि श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के बैकुंठ गमन के बाद उनकी धर्मपत्नी देवी रेवती ने भी सतीत्व की मर्यादा निभाते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
इस भारी शोक के बीच, जब पांडु पुत्र अर्जुन द्वारिका पहुंचे, तो वहां का दृश्य अत्यंत मर्मस्पर्शी था। यदुवंश के विनाश और अपने परम सखा कृष्ण के बिना द्वारिका पूरी तरह अनाथ हो चुकी थी। दुखी मन से अर्जुन ने वहां बचे हुए वृद्धों, बालकों और महिलाओं को एकत्रित किया और उन्हें अपने साथ सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए हस्तिनापुर की ओर निकल पड़े।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जैसे ही अर्जुन ने द्वारिका की सीमा को छोड़ा, वैसे ही समुद्र ने अपनी मर्यादा तोड़ दी। देखते ही देखते विशाल लहरों ने भव्य द्वारिका नगरी को अपने भीतर समेट लिया और वह पूरी तरह समुद्र में विलीन हो गई। श्री कृष्ण के इस धरा से प्रस्थान करते ही द्वापर युग का अंत हो गया और धरती पर अधर्म व पाप के प्रतीक कलियुग का आगमन हुआ। यह घटना दर्शाती है कि जब संसार से साक्षात नारायण विदा होते हैं, तो प्रकृति भी शोक में डूब जाती है और समय का चक्र एक नए और कठिन युग की ओर मुड़ जाता है।
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