श्रुति परंपरा का गौरवशाली इतिहास
भारतीय संस्कृति में ज्ञान के हस्तांतरण का सबसे प्राचीन माध्यम श्रुति परंपरा रहा है। श्रुति का शाब्दिक अर्थ है 'सुना हुआ'। प्राचीन काल में जब लेखन कला का विकास नहीं हुआ था, तब वेदों और धार्मिक ग्रंथों के ज्ञान को गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से बोलकर और सुनकर ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाया जाता था।
वैदिक साहित्य को मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जाता है— श्रुति और स्मृति। चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) सम्मिलित रूप से श्रुति कहे जाते हैं, जिन्हें अपौरुषेय यानी ईश्वर द्वारा प्रकट किया गया माना जाता है। इसके विपरीत, अन्य सभी धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ स्मृति के अंतर्गत आते हैं।
श्रुति परंपरा का इतिहास अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। इतिहासकार और विद्वान इसके समय को लेकर अलग-अलग मत रखते हैं। जर्मन प्राच्यविद प्रोफेसर विंटरनिट्ज के अनुसार, वैदिक साहित्य का रचनाकाल लगभग 2000 से 2500 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है। इस कालखंड में ऋषियों ने ध्यान और साधना के माध्यम से जो गूढ़ सत्य और मंत्र अनुभव किए, वही श्रुति साहित्य के रूप में अमर हो गए।
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