श्रुति: भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का मुख्य आधार
भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में श्रुति का स्थान सबसे सर्वोपरि माना गया है। साधारण शब्दों में कहें तो 'श्रुति' का शाब्दिक अर्थ होता है — सुना हुआ। प्राचीन काल में जब लेखन कला का विकास नहीं हुआ था, तब ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का एकमात्र माध्यम सुनना और याद रखना ही था।
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से श्रुति का तात्पर्य किसी सामान्य मानव द्वारा कहे गए शब्दों से नहीं है। यह सीधे ईश्वर की वाणी मानी जाती है, जिसे प्राचीन काल में महान ऋषियों ने अपने गहन ध्यान और तपस्या की अवस्था में अनुभव किया और सुना था। ऋषियों ने इस परम ज्ञान को स्वयं तक सीमित न रखकर अपने शिष्यों को सुनाया। शिष्यों ने इसे याद किया और आगे चलकर पूरे जगत में इसका प्रचार-प्रसार किया।
इसी दिव्य और अलौकिक स्रोत के कारण श्रुति को धर्म का सबसे पवित्र और महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। सनातन परंपरा के मुख्य ग्रंथ जैसे चारों वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) और उपनिषद श्रुति श्रेणी के अंतर्गत ही आते हैं। इन्हें अनादि और नित्य माना गया है, जिनकी प्रामाणिकता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। आज भी यह ज्ञान परंपरा हमारी धरोहर के रूप में जीवित है।
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