भारतीय शास्त्रीय संगीत में 'गंधर्व' परंपरा
भारतीय संगीत के समृद्ध इतिहास में 'गंधर्व' (गांधार संगीत) का अत्यंत विशिष्ट और पवित्र स्थान माना गया है। प्राचीन नाट्यशास्त्र और संगीत ग्रंथों के अनुसार, यह संगीत की वह प्राचीन और शास्त्रीय शैली है जो मुख्य रूप से तार वाले वाद्यों (जैसे वीणा) के स्वर से प्रभावित होती है। इसके साथ ही बांसुरी, ढोलक और झांझ जैसे अन्य वाद्ययंत्रों का भी इसमें सहज समावेश होता है।
पौराणिक मान्यताओं में इसे देवलोक के संगीतकारों, जिन्हें गंधर्व कहा जाता है, से संबद्ध माना गया है। गंधर्व संगीत की रचना मुख्य रूप से तीन प्रमुख घटकों पर टिकी होती है: स्वर (Notes), ताल (Rhythm) और पद (शब्द)। इन तीनों तत्वों के अनुशासित संयोजन से ही इस संगीत का पूर्ण रूप निर्मित होता है।
सामान्य मनोरंजन के लिए गाए जाने वाले 'गान' की तुलना में, गंधर्व संगीत आध्यात्मिक और अनुष्ठानिक महत्व रखता था। यही कारण है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के नियम, संरचना और उसकी कलात्मक शुद्धता का आधार इसी गंधर्व परंपरा को माना जाता है।
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