सरकार को कर्ज कौन देता है और कैसे काम करता है यह ढांचा?

किसी भी देश को चलाने, बुनियादी ढांचे (जैसे सड़क, पुल, अस्पताल) के विकास और कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के लिए बड़े पैमाने पर फंड की जरूरत होती है। जब सरकार का खर्च उसकी कुल कमाई या राजस्व से ज्यादा हो जाता है, तो उसे आंतरिक और बाहरी स्रोतों से कर्ज लेना पड़ता है।

देश के भीतर कर्ज लेने के लिए सरकार मुख्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities या G-Secs) और ट्रेजरी बिल जारी करती है। यह प्रक्रिया भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के माध्यम से पूरी की जाती है। इन प्रतिभूतियों को खरीदकर व्यावसायिक बैंक, बीमा कंपनियां, कॉरपोरेट संस्थान, म्यूचुअल फंड्स और खुद RBI सरकार को पैसा उधार देते हैं।

अब रिजर्व बैंक के 'आरबीआई रिटेल डायरेक्ट' जैसे कदमों की बदौलत देश के आम नागरिक यानी खुदरा निवेशक (Retail Investors) भी सीधे G-Secs खरीदकर सरकार को कर्ज दे सकते हैं। सरकार इन प्रतिभूतियों के बदले एक तय समय सीमा के बाद ब्याज सहित पैसा वापस करने की गारंटी देती है।

आंतरिक कर्ज के अलावा, आवश्यकता पड़ने पर सरकार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (जैसे विश्व बैंक या एशियाई विकास बैंक) और विदेशी बाजारों या सरकारों से भी कर्ज लेती है। इस तरह, देश के वित्तीय संस्थानों से लेकर आम नागरिक तक, सभी सरकार की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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