पवनपुत्र हनुमान के जन्म की अनोखी कथा

सनातन परंपरा में हनुमान जी को साहस, भक्ति और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनके जन्म को लेकर अक्सर लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हनुमान जी के जन्म में मुख्य रूप से तीन दिव्य शक्तियों का योगदान माना जाता है, जिसके कारण उन्हें अलग-अलग पिताओं का नाम मिला।

सांसारिक रूप से हनुमान जी के पिता राजा केसरी थे, जो सुमेरु पर्वत के वानर राज थे। माता अंजना ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। यही कारण है कि हनुमान जी को शिव जी का अंश या रुद्रावतार भी माना जाता है।

इसके साथ ही, हनुमान जी के जन्म में पवन देव (वायु देव) की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी। कथा के अनुसार, राजा दशरथ के यज्ञ का पवित्र खीर-प्रसाद एक चील ले उड़ी थी, जिसे पवन देव ने माता अंजना की अंजलि में गिरा दिया। इसे ग्रहण करने से हनुमान जी का जन्म हुआ। वायु के माध्यम से यह प्रसाद मिलने और उनके वेग के समान गति होने के कारण उन्हें पवनपुत्र या मारुति नंदन कहा गया।

इस प्रकार, धार्मिक दृष्टिकोण से हनुमान जी के जन्म में केसरी, भगवान शिव और पवन देव तीनों का जुड़ाव है, जो उनकी अलौकिक शक्तियों को दर्शाता है।

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