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क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक ऐसी मशीन जो एक सेकंड में इतने गुणा-भाग कर ले, जिसे गिनने में पूरी मानवता की कई पीढ़ियां खप जाएं? जब हम डेटा, गणना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के चरम दौर में जी रहे हैं, तब भारत के पास एक ऐसा डिजिटल दैत्य है जो वैश्विक मंच पर अपनी धमक जमा चुका है। वर्तमान समय में पुणे के सी-डैक (C-DAC) में स्थापित 'ऐरावत' (AIRAWAT - PSAI) भारत का सबसे शक्तिशाली और तीव्र गति वाला सुपरकंप्यूटर है। यह सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि भारत की संप्रभु कंप्यूटिंग क्षमता का वह जीवंत प्रमाण है जो 13.17 पेटाफ्लॉप्स की चरम क्षमता के साथ पूरी दुनिया को अपनी ताकत दिखा रहा है।
परिकल्पना से स्थापना तक: भारतीय सुपरकंप्यूटिंग की अंतर्कथा
भारत में सुपरकंप्यूटिंग की यात्रा किसी हॉलीवुड फिल्म की पटकथा जैसी रोमांचक रही है। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में जब पश्चिमी देशों ने भारत को मौसम विज्ञान और अनुसंधान के लिए 'क्रे' (Cray) सुपरकंप्यूटर देने से साफ मना कर दिया, तब दिल्ली के गलियारों में निराशा नहीं, बल्कि एक जिद ने जन्म लिया। वाशिंगटन के उस इनकार ने भारतीय वैज्ञानिकों को झकझोर कर रख दिया और इसी का नतीजा था कि 1991 में सी-डैक ने स्वदेशी 'परम 8000' (PARAM 8000) बनाकर दुनिया को चौंका दिया।
समय बदला, तकनीक बदली और साल 2015 में भारत सरकार ने 'राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन' (National Supercomputing Mission) की नींव रखी। साढ़े चार हजार करोड़ रुपये के इस महाप्रोजेक्ट का एकमात्र उद्देश्य था विदेशी निर्भरता को जड़ से उखाड़ फेंकना। इसी मिशन के तहत जन्म हुआ 'ऐरावत' और हालिया 'परम रुद्र' (PARAM Rudra) जैसी महामशीनों का। ऐरावत को विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीप लर्निंग की भारी-भरकम गणनाओं को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया था। भारत सरकार का इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय जानता था कि भविष्य डेटा का है, और जिसके पास डेटा को प्रोसेस करने की सबसे तेज रफ्तार होगी, दुनिया पर राज वही करेगा। आज ऐरावत पुणे की प्रयोगशाला में चौबीसों घंटे बिना थके ब्रह्मांडीय रहस्यों से लेकर देश की सुरक्षा तक के समीकरण सुलझा रहा है।
परतों के पीछे का विज्ञान: कैसे काम करता है यह डिजिटल महाबली?
एक साधारण घरेलू कंप्यूटर के मुकाबले सुपरकंप्यूटर का काम करने का तरीका पूरी तरह अलग होता है। इसे समझने के लिए हमें इसके अंदरूनी ताने-बाने को करीब से देखना होगा। ऐरावत कोई एक विशाल डिब्बा नहीं है, बल्कि यह हजारों की संख्या में जुड़े उच्च क्षमता वाले कंप्यूटर नोड्स (Nodes) का एक जटिल जाल है।
समान्तर प्रसंस्करण (Parallel Processing) इसका मूल मंत्र है। जब हम कोई जटिल काम इसे सौंपते हैं, तो इसका मुख्य नियंत्रण तंत्र उस कार्य को लाखों छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ देता है। इसके बाद, इसके हजारों ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) और सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट्स (CPUs) एक साथ, एक ही पल में उन सभी हिस्सों पर काम करना शुरू कर देते हैं। इसमें अत्यधिक उन्नत आर्किटेक्चर का प्रयोग किया गया है जो टेराबाइट्स प्रति सेकंड की गति से डेटा को एक छोर से दूसरे छोर तक भेजता है।
इतनी भयंकर बिजली और प्रोसेसिंग के कारण ये मशीनें कुछ ही मिनटों में इतनी गर्म हो सकती हैं कि पिघल जाएं। इसलिए, इसमें लिक्विड कूलिंग (Direct Contact Liquid Cooling) तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जहाँ विशेष प्रकार के तरल पदार्थ इन सर्वरों के बीच से गुजरते हैं और तापमान को हमेशा नियंत्रित रखते हैं। यह पूरी प्रक्रिया इतनी सटीक होती है कि एक सेकंड के अरबवें हिस्से में भी कोई गड़बड़ी नहीं होती। साथ ही, इसका स्वदेशी सॉफ्टवेयर स्टैक इसके हार्डवेयर को बिना किसी रुकावट के लगातार काम करने की आजादी देता है।
जब बादलों ने रास्ता बदला: चक्रवात की सटीक भविष्यवाणी का सजीव उदाहरण
सुपरकंप्यूटर सिर्फ प्रयोगशाला की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं होते, इनका सीधा जुड़ाव इंसानी जान बचाने से होता है। कुछ समय पहले जब भारत के तटीय क्षेत्र में एक भयंकर चक्रवात की आहट हुई, तब मौसम वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी यह पता लगाना कि यह तूफान किस शहर से और कितनी रफ्तार से टकराएगा। सामान्य कंप्यूटरों को इस डेटा का विश्लेषण करने में हफ़्तों लग जाते, और तब तक तबाही मच चुकी होती।
वैज्ञानिकों ने समुद्र के तापमान, हवा के दबाव, आर्द्रता और पिछले पचास सालों के सैटेलाइट डेटा को मिलाकर एक महा-समीकरण तैयार किया और उसे सुपरकंप्यूटिंग ग्रिड को सौंप दिया। ऐरावत और मौसम विभाग के अन्य हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम्स ने महज कुछ घंटों के भीतर अरबों गणनाएं कर डालीं। मशीन ने सटीक कोऑर्डिनेट्स के साथ बता दिया कि चक्रवात अपनी दिशा बदलने वाला है और अमुक बंदरगाह के पास लैंडफॉल करेगा। इस सटीक और समय रहते मिली जानकारी के कारण सरकार ने लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया। सुपरकंप्यूटर की इसी तीव्र गणना क्षमता ने उस दिन हजारों परिवारों को उजड़ने से बचा लिया, जो यह साबित करता है कि यह तकनीक भारत के लिए एक सुरक्षा कवच है।
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