पलक झपकते ही दिल्ली से बीजिंग की दूरी तय कर लेना। यह कोई साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि आज की कड़वी सैन्य सच्चाई है। जब बात आती है कि भारत के पास कितनी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं, तो इसका सीधा और सटीक जवाब है: भारत के पास वर्तमान में कोई भी पूर्णतः तैनात, ऑपरेशनल हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल सैन्य बेड़े में शामिल नहीं है, लेकिन देश ने नवंबर 2024 में अपनी पहली लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल का सफल परीक्षण कर दुनिया को चौंका दिया है। आधिकारिक तौर पर रणनीतिक कारणों से सटीक संख्या छिपाई जाती है, मगर विकासात्मक प्रोटोटाइप और परीक्षण प्रणालियों की संख्या लगभग तीन से चार है।

ब्रह्मांडीय गति का इतिहास: भारत का हाइपरसोनिक सफर कब और कैसे शुरू हुआ?

भारतीय मिसाइल तकनीक का इतिहास हमेशा से रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी डीआरडीओ के वैज्ञानिकों के पसीने से लिखा गया है। हाइपरसोनिक तकनीक की नींव तब पड़ी जब भारत ने महसूस किया कि पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम, जैसे अमेरिका के पैट्रियट या रूस के एस-400, के सामने कमजोर पड़ सकती हैं। सन 2019-2020 के आसपास भारत ने हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर व्हीकल यानी एचएसटीडीवी पर काम तेज किया। यह कोई आम रॉकेट साइंस नहीं थी। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के आत्मनिर्भरता के सपने को आगे बढ़ाते हुए, स्वदेशी स्क्रैमजेट इंजन का विकास किया गया। चीन और अमेरिका के बीच चल रहे शीत युद्ध जैसे माहौल ने भारत को मजबूर किया कि वह केवल एक दर्शक बनकर न रहे। पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद अगर भारत की सैन्य शक्ति में कोई सबसे बड़ा मील का पत्थर आया है, तो वह यही हाइपरसोनिक सफर है, जिसने भारत को उन चुनिंदा चार-पांच देशों की कतार में खड़ा कर दिया है जो ध्वनि की रफ्तार को खिलौना समझते हैं।

मैक 5 की हैरतअंगेज रफ्तार: यह तकनीक आखिर काम कैसे करती है?

हाइपरसोनिक मिसाइलें पारंपरिक मिसाइलों से बिल्कुल जुदा होती हैं। इनके काम करने के तरीके को हम तीन चरणों में समझ सकते हैं। पहला चरण है 'बूस्ट फेज', जिसमें मिसाइल को एक शक्तिशाली सॉलिड रॉकेट मोटर के जरिए आसमान की अंधी ऊंचाइयों तक धकेला जाता है ताकि वह आवश्यक गति हासिल कर सके। दूसरा चरण सबसे महत्वपूर्ण है, जिसे 'स्क्रैमजेट इग्निशन' कहते हैं। जब मिसाइल ध्वनि की गति से पांच गुना ज्यादा यानी मैक 5 या उससे अधिक की रफ्तार पकड़ती है, तो वायुमंडल की हवा अत्यधिक दबाव के साथ इंजन के अंदर आती है। पारंपरिक जेट इंजनों के विपरीत, स्क्रैमजेट में घूमते हुए पंखे नहीं होते; यह आने वाली हवा की गति का ही उपयोग करके ईंधन को जलाता है और भयंकर थ्रस्ट पैदा करता है। तीसरा और सबसे खतरनाक चरण है 'अल्टीमेट मैन्युवरेबिलिटी' यानी हवा में रास्ता बदलने की क्षमता। बैलिस्टिक मिसाइलें एक निश्चित परवलयाकार (पैराबोलिक) रास्ते पर चलती हैं, जिससे उनका अंदाजा लगाना आसान होता है। इसके विपरीत, हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल वायुमंडल की ऊपरी सतह पर तैरते हुए, लगातार अपनी दिशा बदलते हैं, जिससे दुनिया का कोई भी रडार या कंप्यूटर उनके सटीक निशाने का अनुमान नहीं लगा पाता।

ओडिशा का वह ऐतिहासिक संडे: नवंबर 2024 का लाइव केस स्टडी

16 नवंबर 2024 की वह रात भारतीय रक्षा इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गई। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप, जो ओडिशा के तट पर स्थित है, वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। डीआरडीओ के वैज्ञानिक एक ऐसे मिशन पर थे जो भारत की किस्मत बदलने वाला था। भारत ने अपनी पहली लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल का सफल उड़ान परीक्षण किया। इस मिसाइल को विभिन्न प्रकार के पेलोड (हथियार) ले जाने के लिए डिजाइन किया गया था, जिसकी मारक क्षमता 1500 किलोमीटर से अधिक आंकी गई। जैसे ही मिसाइल ने उड़ान भरी, जमीन पर लगे रडार और समंदर में तैनात जहाजों के इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम ने उसकी हर हरकत पर नजर रखी। मिसाइल ने हवा में अत्यंत जटिल युद्धाभ्यास (मैन्यूवर) किए और बंगाल की खाड़ी में तय किए गए टारगेट पर बिल्कुल सटीक और अचूक निशाना लगाया। इस परीक्षण ने साबित कर दिया कि भारत के पास न केवल थ्योरी है, बल्कि एक ऐसी व्यावहारिक और खतरनाक तकनीक है जो दुश्मन के होश उड़ाने के लिए काफी है।

हाइपरसोनिक तकनीक पर विशेषज्ञों की राय

सैन्य और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का हाइपरसोनिक मिसाइल कार्यक्रम केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, चीन द्वारा अपनी हाइपरसोनिक क्षमताओं को तेजी से बढ़ाने और पाकिस्तान को उन्नत मिसाइल तकनीक देने के बाद भारत के लिए 'डिटेरेंस' (प्रतिरोधक क्षमता) बनाए रखना बेहद जरूरी हो गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की रणनीति प्रथम दृष्टया आक्रामक होने के बजाय एक मजबूत सुरक्षा कवच तैयार करने की है। डीआरडीओ द्वारा विकसित की जा रही लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LRAShM) और ब्रह्मोस-2 जैसे प्रोजेक्ट्स हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना को अजेय बढ़त देंगे। हालांकि, कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इन तकनीकों के पूरी तरह से बड़े पैमाने पर उत्पादन और सेना में सक्रिय तैनाती में अभी कुछ साल का समय लगेगा। लेकिन हालिया सफल परीक्षणों ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब इस अत्याधुनिक रक्षा क्लब में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित हो चुका है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: क्या भारत के पास वर्तमान में कोई सक्रिय हाइपरसोनिक मिसाइल तैनात है, और इसकी मारक क्षमता क्या है?

उत्तर: वर्तमान में, भारत अपनी हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणालियों के अंतिम चरण के विकासात्मक परीक्षणों और सीमित उत्पादन के दौर में है। हाल ही में भारत ने अपनी लॉन्ग रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LRAShM) का सफल परीक्षण किया है, जिसने लगभग 1,500 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लक्ष्य को मैक 6 से मैक 10 (आवाज की गति से 6 से 10 गुना तेज) की अविश्वसनीय रफ्तार से नष्ट किया। इसके अलावा, भारत रूस के साथ मिलकर ब्रह्मोस-2 (हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल) और स्वदेशी हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर व्हीकल (HSTDV) पर तेजी से काम कर रहा है, जो अगले कुछ वर्षों में पूरी तरह सेना का हिस्सा बन जाएंगी।

प्रश्न 2: बैलिस्टिक मिसाइलों की तुलना में हाइपरसोनिक मिसाइलें दुश्मन के लिए अधिक खतरनाक क्यों मानी जाती हैं?

उत्तर: पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलें एक निश्चित परवलयाकार (parabolic) रास्ते पर चलती हैं, जिससे आधुनिक रडार और एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे आयरन डोम या एस-400) उनकी दिशा का अनुमान लगाकर उन्हें हवा में ही नष्ट कर सकते हैं। इसके विपरीत, हाइपरसोनिक मिसाइलें न केवल मैक 5 से अधिक की अत्यधिक गति से उड़ती हैं, बल्कि वे उड़ान के दौरान अपनी दिशा बदलने (maneuverability) में पूरी तरह सक्षम होती हैं और काफी कम ऊंचाई पर उड़ती हैं। इस लचीलेपन और गति के कारण दुनिया का कोई भी उन्नत डिफेंस सिस्टम इन्हें ट्रैक या इंटरसेप्ट नहीं कर पाता, जिससे दुश्मन को संभलने का एक सेकंड का भी समय नहीं मिलता।

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एक विचारणीय प्रश्न

जिस गति से दुनिया की महाशक्तियां और भारत हाइपरसोनिक हथियारों की इस अभूतपूर्व होड़ में आगे बढ़ रहे हैं, क्या वह भविष्य में युद्ध को रोकने का जरिया बनेगी, या फिर एक ऐसी अदृश्य और अनियंत्रित सैन्य रेस की शुरुआत करेगी जिसे रोकना किसी भी वैश्विक संगठन के बस में नहीं होगा?