क्या आप जानते हैं कि एक ही देश में महज कुछ किलोमीटर का बॉर्डर पार करते ही पेट्रोल की कीमत में 25 से 30 रुपये प्रति लीटर का बड़ा अंतर आ जाता है? जहां पोर्ट ब्लेयर में लोग लगभग 82 रुपये प्रति लीटर में अपनी गाड़ी की टंकी फुल करा लेते हैं, वहीं आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में आम जनता को प्रति लीटर 109 से 113 रुपये तक ढीले करने पड़ते हैं। भारत में वर्तमान समय में सबसे महंगा पेट्रोल आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बिक रहा है। इसके ठीक पीछे मध्य प्रदेश, केरल और राजस्थान जैसे राज्य खड़े हैं, जहां स्थानीय करों का भारी बोझ ईंधन के हर एक कतरे पर मढ़ दिया गया है।

भारत में ईंधन की असमान दरों का इतिहास और पृष्ठभूमि

पुराने दौर को याद करें तो भारत सरकार ईंधन की कीमतों पर कड़ा नियंत्रण रखती थी। 2010 से पहले केंद्र सरकार तय करती थी कि देश में पेट्रोल किस भाव पर बिकेगा। जून 2010 में मनमोहन सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया और आगे चलकर अक्टूबर 2014 में मोदी सरकार ने डीजल को भी बाजार के हवाले कर दिया। इसका मकसद था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें गिरें तो उसका सीधा फायदा भारतीय उपभोक्ता को मिले।

लेकिन असल कहानी यहीं से उलझ गई। पेट्रोल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया। नतीजा यह हुआ कि केंद्र सरकार ने इस पर उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी लगाना शुरू किया और राज्य सरकारों ने अपनी कमाई बढ़ाने के लिए मनमाफिक मूल्यवर्धित कर (वैट) थोपना चालू कर दिया। यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जिसने पूरे देश में ईंधन दरों की भारी असमानता को जन्म दिया। जो राज्य अपनी वित्तीय आय बढ़ाने के लिए भारी-भरकम वैट और अतिरिक्त सेस वसूलते हैं, वहां पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगीं।

पेट्रोल की कीमत तय होने की चरणबद्ध प्रक्रिया

पेट्रोल पंप पर दिखने वाली हर एक लीटर की कीमत के पीछे एक जटिल और बहुस्तरीय गणना काम करती है। इसे आसान चरणों में इस प्रकार समझा जा सकता है:

पहला चरण: कच्चा तेल और रिफाइनरी लागत: भारतीय तेल कंपनियां विदेश से बैरल के हिसाब से क्रूड ऑयल खरीदती हैं। रिफाइनरी इस कच्चे तेल को साफ करके पेट्रोल में बदलती है। इस शुरुआती बेस प्राइस में अंतरराष्ट्रीय बाजार की दरें और डॉलर-रुपये का विनिमय दर शामिल होता है।

दूसरा चरण: माल ढुलाई और डीलर कमीशन: रिफाइनरी से पेट्रोल डिपो और फिर वहां से आपके नजदीकी पेट्रोल पंप तक तेल पहुंचाने की ढुलाई जोड़ी जाती है। इसके बाद पेट्रोल पंप मालिक यानी डीलर का तय कमीशन इसमें जोड़ा जाता है।

तीसरा चरण: केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी: इस पड़ाव पर केंद्र सरकार अपना तय उत्पाद शुल्क लगाती है। यह शुल्क पूरे देश के लिए एक समान होता है, इसलिए इसमें राज्य-दर-राज्य कोई बदलाव नहीं होता।

चौथा चरण: राज्यों का वैट और स्थानीय सेस: यही वह मुख्य चरण है जहां सारा खेल बदलता है। हर राज्य सरकार अपनी इच्छा और बजटीय जरूरतों के अनुसार अलग-अलग प्रतिशत में वैट, रोड सेस और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट टैक्स वसूलती है। यही कारण है कि आंध्र प्रदेश में उच्च वैट के साथ अतिरिक्त सेस लगता है, जबकि कुछ अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में कर की दर काफी कम है।

पांचवां चरण: दैनिक संशोधन: तेल विपणन कंपनियां रोजाना सुबह 6 बजे अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल के पिछले 15 दिनों के औसत रुझान के आधार पर नई दरें जारी करती हैं।

एक व्यावहारिक उदाहरण: आंध्र प्रदेश बनाम अंडमान और पड़ोसी राज्य

इस पूरी विषमता को गहराई से समझने के लिए एक वास्तविक उदाहरण देखते हैं। यदि आप आंध्र प्रदेश के चित्तूर या अमरावती शहर में पेट्रोल पंप पर खड़े हैं, तो आपको एक लीटर के लिए लगभग 109 से 113 रुपये देने पड़ते हैं। वहीं दूसरी तरफ, यदि आप आंध्र प्रदेश से थोड़ी ही दूर अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह पहुंच जाएं, तो वहां वैट दर बेहद कम होने के कारण पेट्रोल सिर्फ 82 रुपये के आसपास मिल जाता है।

एक और ज़मीनी केस स्टडी देखें। मध्य प्रदेश और गुजरात के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोग रोजाना इस फर्क को महसूस करते हैं। मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में पेट्रोल का दाम 108 रुपये से अधिक रहता है, जबकि सिर्फ कुछ किलोमीटर दूर गुजरात के दाहोद में यह 94 से 95 रुपये में मिल जाता है। जो नौकरीपेशा व्यक्ति रोज 40 किलोमीटर का सफर तय करता है, उसे आंध्र प्रदेश या मध्य प्रदेश में रहने के कारण हर महीने पेट्रोल पर 2,000 से 3,000 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ते हैं। यह सीधा उदाहरण दिखाता है कि राज्य सरकारों की कर नीतियां कैसे एक आम इंसान के मासिक बजट को बिगाड़ सकती हैं।

What experts say about it

अर्थशास्त्रियों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन की कीमतों में यह राज्यवार अंतर भारत की कर प्रणाली की विषमताओं को उजागर करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य सरकारें मूल्य संवर्धित कर (VAT) और उपकर को राजस्व संग्रह का एक आसान साधन मानती हैं। चूंकि राज्य सरकारों के पास कर आय के सीमित प्रत्यक्ष स्रोत होते हैं, वे राजकोषीय घाटे को कम करने और अपनी कल्याणकारी योजनाओं का वित्तपोषण करने के लिए मुख्य रूप से पेट्रोल और डीजल पर निर्भर रहती हैं।

विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि जब तक पेट्रोलियम उत्पादों को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में नहीं लाया जाता, तब तक यह क्षेत्रीय असमानता समाप्त नहीं होगी। हालांकि, अधिकांश राज्य जीएसटी का विरोध करते हैं क्योंकि इससे उनके राजस्व नियंत्रण की स्वतंत्रता छीन जाएगी। इस स्थिति में, विभिन्न राज्यों के नागरिकों के बीच दैनिक परिवहन लागत का अंतर लगातार बना रहेगा और आम उपभोक्ताओं पर आर्थिक दबाव बढ़ाएगा।

Frequently Asked Questions

भारत में सबसे महंगा पेट्रोल किस राज्य में है और क्यों?

वर्तमान में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में पेट्रोल की कीमतें भारत में सबसे अधिक हैं। आंध्र प्रदेश में प्रति लीटर पेट्रोल की दर लगभग 115 से 117 रुपये के स्तर को छू जाती है। इसका मुख्य कारण राज्य सरकार द्वारा लगाया जाने वाला उच्च प्रतिशत VAT (वैल्यू ऐडेड टैक्स), अतिरिक्त सेस (जैसे रोड सेस) और परिवहन लागत है, जो खुदरा मूल्य को काफी बढ़ा देते हैं।

क्या पेट्रोल को GST के दायरे में लाने से कीमतें कम होंगी?

हां, यदि पेट्रोल को GST के तहत लाया जाता है, तो देश भर में ईंधन की दरें काफी हद तक एक समान हो जाएंगी। यदि पेट्रोल पर उच्चतम जीएसटी दर (28%) भी लगाई जाती है, तब भी इसकी अंतिम खुदरा कीमत मौजूदा कीमतों से काफी कम हो जाएगी। इससे उपभोक्ता को राहत मिलेगी, लेकिन केंद्र और राज्यों दोनों के कर राजस्व में भारी गिरावट आएगी।

क्या एक ही देश में बुनियादी ईंधन की दरों में इतना बड़ा अंतर होना भारत के आर्थिक संतुलन और आम नागरिकों के प्रति न्यायसंगत है?