आर्थिक गलियारों और सोशल मीडिया के मंचों पर अक्सर यह सवाल बड़ी तेजी से तैरता नजर आता है कि क्या भारत सरकार या बैंकों ने अडानी समूह के अरबों-खरबों रुपये के कर्जे को पूरी तरह माफ कर दिया है? सच्चाई यह है कि किसी भी बैंक या वित्तीय संस्थान द्वारा अडानी ग्रुप का एक भी रुपया माफ (Loan Waiver) नहीं किया गया है। कॉर्पोरेट वित्त और बैंकिंग शब्दावली में 'अंडरराइटिंग' या बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए क्रेडिट लाइन स्वीकृत करने को अक्सर गलत तरीके से कर्ज माफी के रूप में प्रचारित कर दिया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कोसों दूर है।

अडानी ग्रुप के उदय और वित्तपोषण की लंबी पृष्ठभूमि

अडानी समूह की शुरुआत एक छोटे कमोडिटी ट्रेडिंग बिजनेस के तौर पर हुई थी, जो धीरे-धीरे बंदरगाहों, ऊर्जा, हवाई अड्डों और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विशालसाम्राज्य में तब्दील हो गया। बुनियादी ढांचे के विकास वाले इन मेगा प्रोजेक्ट्स में भारी-भरकम पूंजी यानी कैपिटल की आवश्यकता होती है, जिसे अकेले आंतरिक संसाधनों से पूरा करना नामुमकिन होता है। इसी वजह से इस समूह ने देश-विदेश के सार्वजनिक और निजी बैंकों, वैश्विक बांड बाजारों तथा वित्तीय संस्थाओं से बड़े पैमाने पर ऋण जुटाया। दशकों की इस यात्रा में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का वित्तपोषण हमेशा पारंपरिक बैंकिंग प्रणालियों और सिंडिकेटेड लोन के जरिए ही संचालित होता रहा है।

बैंकिंग प्रणाली में कर्ज स्वीकृत और अंडरराइटिंग प्रक्रिया कैसे काम करती है

जब कोई विशाल वित्तीय संस्थान या बैंकों का संघ (Consortium) किसी बड़े प्रोजेक्ट को फंड करता है, तो सबसे पहले उसकी संपूर्ण वित्तीय सेहत और जोखिम उठाने की क्षमता का बारीकी से आंकलन किया जाता है। इस प्रक्रिया को 'अंडरराइटिंग' कहा जाता है, जिसका सीधा अर्थ यह होता है कि बैंक यह जोखिम उठाने को तैयार होते हैं कि संबंधित कंपनी समय पर ब्याज और मूलधन चुका देगी। यदि कोई बैंक किसी प्रोजेक्ट के लिए हजारों करोड़ रुपये की क्रेडिट लिमिट तय करता है, तो उसका मतलब यह कतई नहीं होता कि वो राशि मुफ्त में दे दी गई या उसका लोन राइट-ऑफ कर दिया गया। हर एक पाई का हिसाब कॉरपोरेट बैलेंस शीट में दर्ज होता है और तय समयसीमा के भीतर कड़े नियमों के तहत उसका भुगतान किया जाता है।

नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रोजेक्ट का एक स्पष्ट मिनी केस स्टडी

इस पूरे भ्रम की शुरुआत अक्सर विशिष्ट परियोजनाओं के वित्तीय आंकड़ों को संदर्भ से हटकर पेश करने से होती है। उदाहरण के लिए, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) द्वारा अडानी समूह के नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड प्रोजेक्ट के लिए लगभग बारह हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि को अंडरराइट किए जाने की खबर सामने आई थी। सोशल मीडिया पर इस प्रक्रिया को गलत रूप देते हुए यह अफवाह फैला दी गई कि जनता के खून-पसीने की कमाई का यह लोन माफ कर दिया गया है। वास्तविक धरातल पर यह एक विशुद्ध व्यावसायिक ऋण व्यवस्था थी, जिसके एवज में बैंक ने पुख्ता संपत्तियां और परिसंपत्तियां गिरवी रखीं तथा भविष्य के एयरपोर्ट राजस्व से इस कर्ज की सुरक्षित वसूली की पूरी रूपरेखा तैयार की गई थी।