सन 2022 में वैश्विक सार्वजनिक कर्ज आसमान छूते हुए रिकॉर्ड 92 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर गया था, जो आधुनिक इतिहास में एक अभूतपूर्व वित्तीय संकट की ओर इशारा करता है। इस मक्कड़जाल में केवल विकासशील देश ही नहीं, बल्कि महाशक्तियां भी बुरी तरह जकड़ी हुई थीं, जहां अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था के आकार को पीछे छोड़ते हुए 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का भारी-भरकम बोझ अपने सिर पर उठा रखा था।

वैश्विक ऋण संकट की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक नीतियां

ऋण लेने की यह प्रवृत्ति रातों-रात पैदा नहीं हुई थी, बल्कि इसकी जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की राजकोषीय नीतियों और बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हुए भू-राजनीतिक बदलावों में गहराई तक समाई हुई हैं। उपनिवेशवाद के खात्मे के बाद जब नव-स्वतंत्र राष्ट्रों ने अपने बुनियादी ढांचे—जैसे सड़कें, रेलवे और ऊर्जा ग्रिड—का निर्माण शुरू किया, तो घरेलू राजस्व नाकाफी साबित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से भारी मात्रा में विदेशी ऋण लेने का सिलसिला आरंभ हुआ। धीरे-धीरे कल्याणकारी योजनाओं के वित्तपोषण और सैन्य आधुनिकीकरण के नाम पर सरकारों ने बजट घाटे को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया, जिससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएं निरंतर उधार के चक्रव्यूह में फंसती चली गईं और राजकोषीय घाटा एक स्थायी बीमारी का रूप ले बैठा।

राजकोषीय चक्र और कर्ज प्रबंधन की कार्यप्रणाली

राष्ट्रीय ऋण का यह पूरा ताना-बाना एक जटिल चक्र के रूप में काम करता है, जिसे सरकारें और केंद्रीय बैंक चरण-बदर तरीके से संचालित करते हैं। सबसे पहले, जब किसी देश का कर संग्रह (tax collection) उसकी विकास योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने में विफल रहता है, तब सरकार ट्रेजरी बॉण्ड और सिक्योरिटीज जारी करके घरेलू या अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से पूंजी जुटाती है। दूसरे चरण में, ये बॉण्ड्स वैश्विक वित्तीय बाजारों में बेचे जाते हैं जिन पर एक निश्चित ब्याज दर चुकानी होती है, और जैसे-जैसे समयावधि बीतती है, पुराने ऋणों को चुकाने के लिए नए ऋण लेने की यह निरंतर प्रक्रिया एक खतरनाक ऋणजाल (debt trap) का रूप धारण कर लेती है। अंततः, यदि देश की आर्थिक वृद्धि दर उस पर लगने वाले ब्याज से अधिक नहीं हो पाती, तो भुगतान संतुलन बिगड़ जाता है और सरकार को मजबूरन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी संस्थाओं के पास जाकर कड़ी शर्तों पर बेलआउट पैकेज मांगने पड़ते हैं।

ऋणजाल का यथार्थ: एक लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था का सूक्ष्म अध्ययन

इस वित्तीय विभीषिका को समझने के लिए अर्जेंटीना का उदाहरण एक जीवंत और सटीक केस स्टडी प्रस्तुत करता है, जिसने दशकभर की आर्थिक अस्थिरता के बाद 2022 में भी विदेशी ऋणों के भारी दबाव का सामना किया था। अत्यधिक मुद्रास्फीति, पेसो के अवमूल्यन और लचर निर्यात नीतियों के कारण इस देश को अपने विदेशी ऋणों का पुनर्गठन (restructuring) करने के लिए अंतरराष्ट्रीय लेनदारों के साथ बार-बार मैराथन बैठकें करनी पड़ीं, जहां हर बार की असफलता ने वहां के नागरिकों को कमरतोड़ महंगाई और करों के बोझ तले दबा दिया। इस मिसाल से यह स्पष्ट रूप से उजागर होता है कि जब कोई राष्ट्र अपनी वास्तविक उत्पादकता को ताक पर रखकर अंधाधुंध उधार पर निर्भर हो जाता है, तो उसकी संप्रभुता किस प्रकार वैश्विक वित्त बाजारों के हाथों गिरवी रख जाती है।

What experts say about it

आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है कि किसी भी देश पर कर्ज होना पूरी तरह से नकारात्मक नहीं है, बशर्ते उसका सही उपयोग उत्पादक कार्यों में किया जाए। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, जब कोई सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निवेश के लिए उधार लेती है, तो इससे देश की उत्पादन क्षमता बढ़ती है और भविष्य में जीडीपी में तेजी आती है। हालांकि, विशेषज्ञों की चिंता इस बात को लेकर है कि वैश्विक स्तर पर लगातार बढ़ते सरकारी कर्ज और महंगाई के माहौल में कई विकासशील देश अपने वित्तीय संतुलन को खोते जा रहे हैं। यदि कर्ज का अनुपात देश की कुल जीडीपी के मुकाबले खतरनाक स्तर तक पहुंच जाए, तो वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है और देश को भारी आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ सकता है।

Frequently Asked Questions

क्या किसी देश का पूरी तरह कर्ज मुक्त होना संभव है?

व्यावहारिक रूप से आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी भी प्रमुख देश का पूरी तरह से कर्ज मुक्त होना लगभग असंभव है। आधुनिक वित्तीय प्रणाली में सरकारें आंतरिक बांड, ट्रेजरी सिक्योरिटीज और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के जरिए लगातार ऋण का लेन-देन करती रहती हैं। यहां तक कि मजबूत अर्थव्यवस्थाएं भी विकास परियोजनाओं और आपातकालीन परिस्थितियों के लिए उधार लेती हैं, इसलिए महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कर्ज शून्य है या नहीं, बल्कि यह है कि सरकार उसे चुकाने की कितनी क्षमता रखती है।

जीडीपी और कर्ज के अनुपात का क्या मतलब होता है?

कर्ज-से-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP Ratio) किसी देश की आर्थिक सेहत को मापने का एक महत्वपूर्ण पैमाना है। यह प्रतिशत के रूप में यह दर्शाता है कि देश की कुल अर्थव्यवस्था (जीडीपी) की तुलना में उस पर कुल कितना बकाया कर्ज है। उदाहरण के लिए, यदि किसी देश की जीडीपी 100 रुपये है और उस पर 80 रुपये का कर्ज है, तो उसका अनुपात 80% होगा। यह अनुपात जितना कम होता है, देश की आर्थिक स्थिति उतनी ही अधिक मजबूत और सुरक्षित मानी जाती है।

End with a provocative open question to the reader

जब दुनिया के सबसे ताकतवर देश खुद खरबों डॉलर के कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं, तो क्या आने वाले समय में यह वैश्विक वित्तीय मॉडल पूरी तरह से ढह जाएगा या कोई नया आर्थिक संकट पूरी मानवता को झकझोर कर रख देगा?