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सनातन परंपरा और आध्यात्मिक दर्शन के अनुसार, परमात्मा किसी भी प्रकार की मानवीय संकीर्णता या जातिगत सीमाओं से परे हैं और उनका स्वरूप विशुद्ध रूप से चेतना एवं सार्वभौमिकता का प्रतीक है।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों और वर्ण व्यवस्था के दार्शनिक आधार का ऐतिहासिक स्वरूप
वैदिक साहित्य और पुराणों का गहन अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में समाज की संरचना जन्म आधारित जातियों पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के गुण, स्वभाव और कर्म के आधार पर तय होती थी जिसे वर्ण व्यवस्था कहा गया है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं यह घोषणा करते हैं कि चतुर्वर्ण मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः, जिसका सीधा अर्थ यह है कि समाज के चार वर्ण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—की रचना मानव के आंतरिक गुणों और उसके द्वारा किए जाने वाले कर्मों के विभाजन के आधार पर की गई थी, न कि किसी संकीर्ण वंशावली या जातिगत खांचे के अंतर्गत। प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों और मनीषियों ने कभी भी ईश्वर को मानवीय जातियों के सीमित दायरे में कैद करने का दुस्साहस नहीं किया। वे भली-भांति जानते थे कि जो शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड, सूर्य, चंद्रमा, और समस्त चराचर जगत का संचालन कर रही है, उसे किसी एक कुल, वंश या जाति विशेष के दायरे में समेटना असंभव और तार्किक रूप से त्रुटिपूर्ण है। ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह भी पता चलता है कि जब भी भगवान ने इस पृथ्वी पर अलग-अलग युगों में अवतार लिया, उन्होंने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के अनुसार विभिन्न कुलों को चुना, किंतु उनका उद्देश्य कभी भी किसी एक विशेष जाति का प्रतिनिधित्व करना नहीं रहा, बल्कि धर्म की स्थापना करना और मानवता का कल्याण करना था।
महापुरुषों और अवतारों के कुलों का विश्लेषण तथा आधुनिक युग की भ्रांतियां
जब हम त्रेतायुग के प्रभु श्रीराम या द्वापरयुग के भगवान श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र का सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं, तो हमें उनके प्रकट होने के स्थान और राजवंशों की जानकारी मिलती है, जैसे भगवान राम का सूर्यवंश के इक्ष्वाकू कुल में जन्म लेना और श्रीकृष्ण का चंद्रवंश के यदुकुल में अवतरित होना। परंतु इन ऐतिहासिक संदर्भों को वर्तमान समय की संकीर्ण जातिगत राजनीति और ध्रुवीकरण के चश्मे से देखना एक भारी वैचारिक भूल और अज्ञानता का प्रतीक है। त्रेतायुग और द्वापरयुग में जो कुलीन वंश थे, वे शासन संचालन, समाज की रक्षा और धर्म की पालना के लिए उत्तरदायी हुआ करते थे, जिन्हें आधुनिक जातिगत अर्थों में बिल्कुल नहीं समझा जा सकता। आज के दौर में कुछ निहित स्वार्थी तत्व अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए और सामाजिक ताने-बाने को विभाजित करने के उद्देश्य से भगवान को विशेष जातियों से जोड़ने का असफल प्रयास करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के आदर्श, उनके उपदेश, उनकी करुणा और उनकी नीतियां संपूर्ण मानवता के लिए थीं, न कि किसी एक सीमित वर्ग या जाति के लिए। जब भक्त अपने आराध्य की पूजा करता है, तो उसके मन में कभी भी भगवान की जाति का कोई विचार नहीं होता, बल्कि उसकी संपूर्ण निष्ठा केवल और केवल उस दिव्य शक्ति के प्रति समर्पित होती है जो संपूर्ण ब्रह्मांड की पालनहार है।
सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक यथार्थ पर पड़ने वाले व्यावहारिक प्रभाव
भगवान को किसी विशेष जाति के बंधन में बांधने की यह प्रवृत्ति हमारे समाज के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो रही है और इससे आपसी द्वेष, वैमनस्य तथा विघटनकारी ताकतों को बढ़ावा मिलता है। जब हम ईश्वर जैसी सर्वव्यापी और अनंत सत्ता को जातिगत उपजातियों के छोटे-छोटे खांचों में विभाजित करने लगते हैं, तब हम अपनी ही सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों को कमजोर कर रहे होते हैं। एक प्रगतिशील और प्रबुद्ध समाज की यह प्राथमिक मांग है कि हम इन संकीर्ण मान्यताओं से ऊपर उठकर प्राचीन भारतीय दर्शन के मूल संदेश को समझें, जो सबको एक ही चेतना का अंश मानता है। संतों और महापुरुषों ने हमेशा यही उपदेश दिया है कि ईश्वर की कोई जाति नहीं होती, बल्कि उनका केवल एक ही गोत्र और धर्म होता है—वह है प्रेम, करुणा, सत्य और धर्म। यदि हम आधुनिक समाज में शांति, भाईचारा और वास्तविक समता स्थापित करना चाहते हैं, तो हमें भगवान के नाम पर हो रही इस अनर्गल और विभाजनकारी राजनीति का पुरजोर विरोध करना होगा। अंततः, भगवान की कोई जाति नहीं है, क्योंकि वे समस्त जातियों, धर्मों और सीमाओं से परे संपूर्ण ब्रह्मांड के एकमात्र और अद्वितीय स्वामी हैं, जिनकी कृपा का अधिकार हर उस प्राणी को है जो सच्चे मन से उनका स्मरण करता है।
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