विषय-सूची
दुनिया भर की न्याय प्रणालियों में जब कभी चिकित्सा और कानून का आमना-सामना होता है, तो कुछ प्रथाएं अपने भीतर गहरे विरोधाभास समेटे नजर आती हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि एक समय जिसे यौन उत्पीड़न के मामलों में सबूत जुटाने का वैज्ञानिक पैमाना मान लिया गया था, वह असल में दशकों तक पीड़ितों की गरिमा को तार-तार करता रहा। दो उंगली परीक्षण यानी 'टू-फिंगर टेस्ट' एक ऐसी ही दर्दनाक और पुरानी चिकित्सीय प्रक्रिया है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से यह तय करने के लिए किया जाता था कि कोई महिला या बच्ची यौन रूप से सक्रिय रही है या नहीं। इस विवादास्पद प्रक्रिया की तह में उतरने पर पता चलता है कि यह केवल एक मेडिकल जांच नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच का एक ऐसा दस्तावेज था जिसे कानून की किताबों ने बहुत पहले खारिज कर देना चाहिए था।
दो उंगली परीक्षण की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक जड़ें
इस कुप्रथा की जड़ें औपनिवेशिक काल की उन रूढ़िवादी मान्यताओं में गहराई तक धंसी हुई हैं, जहां महिलाओं के शरीर को सामाजिक नियंत्रण और नैतिक पुलिसिंग का जरिया माना जाता था। इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि यह परीक्षण अंग्रेजों के समय से चली आ रही फॉरेंसिक पद्धतियों का एक अवशेष मात्र है। सदियों से यह मान लिया गया था कि महिला की वर्जिनिटी यानी कौमार्य का निर्धारण उसके शरीर की शारीरिक बनावट, विशेषकर हाइमन की स्थिति और योनि की मांसपेशियों के ढीलेपन से किया जा सकता है। चिकित्सा विज्ञान के विकास से कोसों दूर, यह मान्यता समाज में गहरी बैठ गई कि यदि किसी महिला की योनि में उंगलियां आसानी से प्रवेश कर जाती हैं, तो वह 'यौन संबंधों की आदी' है। इस पूर्वाग्रह ने अदालतों और पुलिस तंत्र को प्रभावित किया, जहां एक पीड़िता के अतीत को उसके वर्तमान अभियोग से जोड़कर देखा जाने लगा। दशकों तक यह प्रथा चुपचाप चलती रही, जबकि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य संगठनों ने लगातार इसकी वैधता पर सवाल उठाए।
यह प्रक्रिया कैसे काम करती है, चरणबद्ध विश्लेषण
चिकित्सीय और कानूनी दस्तावेजों के अनुसार, इस तथाकथित परीक्षण की प्रक्रिया अत्यंत आक्रामक और अपमानजनक प्रकृति की होती है। इसमें आमतौर पर एक डॉक्टर द्वारा पीड़िता के गुप्तांग में एक या दो उंगलियां डालकर योनि की मांसपेशियों के लचीलेपन यानी लैक्सिटी की जांच की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान निम्नलिखित चरणों और धारणाओं का सहारा लिया जाता रहा है:
- प्रारंभिक शारीरिक निरीक्षण: डॉक्टर सबसे पहले हाइमन की स्थिति का मुआयना करते हैं ताकि यह देखा जा सके कि वह खंडित है या नहीं।
- उंगलियों का प्रवेश: योनि मार्ग के फैलाव को मापने के लिए उंगलियों को अंदर डाला जाता है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि महिला पहले कभी शारीरिक संबंधों में रही है या नहीं।
- निष्कर्ष का आधार: इस पूरी प्रक्रिया के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जाता था कि महिला 'आदि' है या 'आदतन संसर्ग' में लिप्त रही है, जिसे बाद में अदालत में आरोपी के बचाव का आधार बनाया जाता था।
यह पूरी प्रक्रिया किसी भी वैज्ञानिक कसौटी पर खरी नहीं उतरती, क्योंकि चिकित्सा विज्ञान यह स्पष्ट कर चुका है कि हाइमन का टूटना केवल यौन संबंधों से ही नहीं, बल्कि खेलकूद, दौड़ने या अन्य शारीरिक गतिविधियों से भी संभव है। इसके बावजूद, इसे एक स्थापित फॉरेंसिक तकनीक के रूप में सालोंसाल अंजाम दिया जाता रहा।
एक कड़वा उदाहरण और अदालती वास्तविकता का अदृश्य सच
इस व्यवस्था की क्रूरता को समझने के लिए एक सामान्य कानूनी मामले का उदाहरण देखना पर्याप्त होगा। कल्पना कीजिए एक ऐसी पीड़िता की जो पहले ही एक अत्यंत जघन्य अपराध से गुजरी हो और अपने न्याय के लिए थाने या अस्पताल पहुँची हो। वहां न्याय की आस लगाए उस व्यक्ति को मदद की बजाय एक ऐसे परीक्षण से गुजरना पड़ता है जो उसके शारीरिक और मानसिक जख्मों को फिर से हरा कर देता है। अदालतों में जब बचाव पक्ष के वकील इस परीक्षण की रिपोर्ट को आधार बनाते थे, तो पीड़िता के चरित्र को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता था—मानो उसका पिछला जीवन उसकी वर्तमान सुरक्षा के अधिकार को शून्य कर देता हो। सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने अपने ऐतिहासिक फैसलों में बार-बार इस बात को रेखांकित किया है कि यह परीक्षण न केवल अवैज्ञानिक है, बल्कि यह संविधान द्वारा प्रदत्त जीने के अधिकार और निजता के हनन का सबसे वीभत्स रूप है। आज जब इस पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया है, तब भी यह सवाल बाकी है कि सदियों से चली आ रही इस मानसिकता को पूरी तरह बदलने में समाज को और कितना वक्त लगेगा।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।