विषय-सूची
- 1. इस आर्थिक विपन्नता की गहरी जड़ें औपनिवेशिक काल के इतिहास और भौगोलिक विडंबनाओं में गहराई तक धंसी हुई हैं। जब अंग्रेजों ने भारत के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना शुरू किया, तो मध्य भारत के इन सघन जंगलों और पहाड़ी इलाकों को जानबूझकर मुख्यधारा के विकास, रेल नेटवर्क और औद्योगिक गलियारों से पूरी तरह अछूता छोड़ दिया गया। आजादी के बाद भी इस उपेक्षा का सिलसिला थमा नहीं, क्योंकि नीतियां बनाने वाले महानगरों के कमरों में बैठकर फैसले लेते रहे, जबकि ज़मीनी हकीकत इन पथरीली घाटियों और दुर्गम रास्तों तक पहुंच ही नहीं पाई। पीढ़ियों से चली आ रही इस ऐतिहासिक बेरुखी ने यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था को तोड़कर रख दिया, जहां पारंपरिक आजीविका के साधन वक्त के साथ दम तोड़ने लगे और एक ऐसा कुचक्र शुरू हुआ जिससे निकलना आज के दौर में भी लगभग असंभव सा प्रतीत होता है।
- 2. गरीबी से बाहर निकलने के उपाय और भविष्य की राह
भारत का सबसे गरीब शहर: नीति आयोग के आंकड़ों के पीछे छिपी हुई कड़वी और अनकही सच्चाई
आश्चर्यजनक रूप से, देश के सबसे वंचित अंचलों में हर दस में से आठ इंसान बुनियादी ज़रूरतों के बिना ही अपनी ज़िंदगी गुजारने को मजबूर है। यदि सीधे शब्दों में इस सवाल का जवाब तलाशा जाए, तो नीति आयोग के ताज़ा बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार मध्य प्रदेश का अलीराजपुर जिला इस फेहरिस्त में सबसे शीर्ष पर खड़ा नजर आता है, जहां का परिदृश्य आधुनिक विकास के दावों की धज्जियां उड़ा देता है।
इस आर्थिक विपन्नता की गहरी जड़ें औपनिवेशिक काल के इतिहास और भौगोलिक विडंबनाओं में गहराई तक धंसी हुई हैं। जब अंग्रेजों ने भारत के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना शुरू किया, तो मध्य भारत के इन सघन जंगलों और पहाड़ी इलाकों को जानबूझकर मुख्यधारा के विकास, रेल नेटवर्क और औद्योगिक गलियारों से पूरी तरह अछूता छोड़ दिया गया। आजादी के बाद भी इस उपेक्षा का सिलसिला थमा नहीं, क्योंकि नीतियां बनाने वाले महानगरों के कमरों में बैठकर फैसले लेते रहे, जबकि ज़मीनी हकीकत इन पथरीली घाटियों और दुर्गम रास्तों तक पहुंच ही नहीं पाई। पीढ़ियों से चली आ रही इस ऐतिहासिक बेरुखी ने यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था को तोड़कर रख दिया, जहां पारंपरिक आजीविका के साधन वक्त के साथ दम तोड़ने लगे और एक ऐसा कुचक्र शुरू हुआ जिससे निकलना आज के दौर में भी लगभग असंभव सा प्रतीत होता है।
गरीबी से बाहर निकलने के उपाय और भविष्य की राह
भारत के सबसे पिछड़े और गरीब शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों से गरीबी के अभिशाप को मिटाने के लिए केवल सरकारी योजनाएं ही काफी नहीं हैं, बल्कि इसके लिए एक समग्र और ठोस रणनीति की आवश्यकता है। इन क्षेत्रों में आर्थिक सुधार लाने के वास्ते निम्नलिखित कदम उठाने बेहद जरूरी हैं:
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विस्तार: बुनियादी शिक्षा के साथ-साथ तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) को बढ़ावा देना होगा, ताकि युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सके।
औद्योगिकीकरण और निवेश: पिछड़े जिलों और शहरों में छोटे तथा मध्यम उद्योगों (MSME) को स्थापित करने के लिए निवेशकों को विशेष छूट और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण: ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव गरीबी को और बढ़ाता है। अस्पतालों और मेडिकल कैंपों के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाना अनिवार्य है।
कृषि का आधुनिकीकरण: पारंपरिक खेती पर निर्भरता कम करके आधुनिक तकनीकों, फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स और सिंचाई के बेहतर साधनों को अपनाना होगा ताकि किसानों की आय बढ़ सके।
निष्कर्ष
निसंदेह, भारत तेजी से दुनिया की एक प्रमुख आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर है, परंतु जब तक देश के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति या सबसे पिछड़े शहर तक विकास की रोशनी नहीं पहुंचेगी, तब तक यह प्रगति अधूरी है। नीति आयोग के रिपोर्ट्स और बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के आंकड़ों का सही उपयोग करके यदि लक्षित नीतियां बनाई जाएं, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के ये पिछड़े इलाके भी विकास की मुख्यधारा से जुड़कर एक समृद्ध भविष्य का निर्माण करेंगे।
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।