भारत में फुटबॉल कब आया? – एक ऐतिहासिक यात्रा (प्रथम भाग)

ब्रिटिश सेना और छावनियों से हुई शुरुआत

भारत में आधुनिक फुटबॉल को लाने का श्रेय पूरी तरह से ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और खासकर ब्रिटिश सेना के सिपाहियों को जाता है। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (लगभग 1870 के दशक के आसपास) में जब ब्रिटिश साम्राज्य अपने पैर भारत में पूरी तरह जमा चुका था, तो अंग्रेज अधिकारी और सैनिक अपने मनोरंजन के लिए कई खेल अपने साथ लाए थे। इनमें रग्बी और क्रिकेट के साथ-साथ फुटबॉल भी शामिल था।

शुरुआती दौर में फुटबॉल का यह खेल आम भारतीयों के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश रेजिमेंट और सैन्य छावनियों तक ही सीमित था। शाम के वक्त अंग्रेज सैनिक अपने खाली समय में छावनियों के बड़े मैदानों में चमड़े की गेंद से यह खेल खेलते थे। धीरे-धीरे कलकत्ता (अब कोलकाता), बॉम्बे (अब मुंबई) और मद्रास (अब चेन्नई) जैसे बड़े प्रेसिडेंसी शहर इन खेलों के मुख्य केंद्र बनते चले गए।

कलकत्ता: भारतीय फुटबॉल की मक्का का उदय

चूंकि ब्रिटिश भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता थी, इसलिए यह शहर फुटबॉल के विकास का सबसे प्रमुख गवाह बना। बंगाल की आबोहवा और यहां के लोगों का खेलों के प्रति गजब का उत्साह इस विदेशी खेल को अपने भीतर आत्मसात करने के लिए पूरी तरह तैयार था।

वर्ष 1877 के आसपास कलकत्ता के प्रतिष्ठित 'हेयर स्कूल' में पहली बार व्यवस्थित रूप से फुटबॉल खेले जाने के प्रमाण मिलते हैं। यहीं से भारतीयों का इस खेल से सीधा परिचय हुआ। इस कड़ी में एक नाम जो भारतीय फुटबॉल के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, वह है नागेंद्र प्रसाद सर्बधिकारी (Nagendra Prasad Sarbadhikari)।

नागेंद्र प्रसाद सर्बधिकारी: भारतीय फुटबॉल के पितामह

नागेंद्र प्रसाद सर्बधिकारी को 'भारतीय फुटबॉल का जनक' कहा जाता है। किंवदंती है कि जब उन्होंने पहली बार अंग्रेजों को कलकत्ता के मैदानों में फुटबॉल खेलते देखा, तो वह इस खेल से बेहद आकर्षित हुए। उन्होंने न सिर्फ खुद इस खेल को सीखा, बल्कि अपने साथियों और स्कूल के अन्य लड़कों को भी इसके लिए प्रेरित किया। उनके अथक प्रयासों के कारण ही बंगाल के युवाओं ने अंग्रेजों की देखा-देखी फुटबॉल को अपना मुख्य खेल बनाना शुरू कर दिया। सर्बधिकारी ने आगे चलकर कई स्थानीय क्लबों की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई, जिसने बंगाल में फुटबॉल को एक जन-आंदोलन का रूप दे दिया।

शुरुआती टूर्नामेंट और क्लबों का गठन

जैसे-जैसे खेल की लोकप्रियता बढ़ी, वैसे-वैसे छोटे-छोटे क्लबों और प्रतियोगिताओं की आवश्यकता महसूस होने लगी। 1888 में शिमला में डूरंड कप (Durand Cup) की शुरुआत हुई। यह एशिया का सबसे पुराना और दुनिया का तीसरा सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट है, जिसे ब्रिटिश भारत के तत्कालीन विदेश सचिव मोर्टिमर डूरंड ने शुरू किया था। शुरुआत में यह टूर्नामेंट सेना की टीमों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा के लिए था, लेकिन इसने देश में संगठित फुटबॉल की नींव रख दी।

इसके ठीक बाद, साल 1889 में प्रसिद्ध मोहन बागान एथलेटिक क्लब (Mohun Bagan Athletic Club) की स्थापना हुई। यह एशिया के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित फुटबॉल क्लबों में से एक है। मोहन बागान की स्थापना ने यह साबित कर दिया कि भारतीय अब केवल इस खेल के दर्शक नहीं, बल्कि इसके दमदार खिलाड़ी भी बनने लगे हैं।

अन्य क्षेत्रों में फुटबॉल का प्रसार

सिर्फ बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी फुटबॉल ने तेजी से पैर पसारे:

  • गोवा (1883): गोवा में फुटबॉल की शुरुआत का श्रेय मुख्य रूप से ईसाई मिशनरियों और पादरियों (विशेषकर फादर विलियम रॉबर्ट लियोंस) को जाता है, जिन्होंने इसे शैक्षणिक संस्थानों की गतिविधियों का हिस्सा बनाया। आज भी गोवा में फुटबॉल स्थानीय संस्कृति का एक मुख्य हिस्सा है।

  • केरल (1890): तिरुवनंतपुरम के महाराजा कॉलेज के प्रोफेसरों और यूरोपीय पादरियों की प्रेरणा से केरल के युवाओं के बीच भी फुटबॉल तेजी से लोकप्रिय हुआ, जो आज दक्षिण भारत में इस खेल का गढ़ माना जाता है।

इस प्रकार, 19वीं सदी के अंतिम दशकों तक फुटबॉल भारत की मिट्टी में अपनी मजबूत जड़े जमा चुका था। अगले भाग में हम जानेंगे कि कैसे भारतीय क्लबों ने अंग्रेजों को उन्हीं के खेल में धूल चटाई और भारतीय फुटबॉल का 'स्वर्ण युग' शुरू हुआ।

Indian Football History | From 1911 to Today | Indian F...

यह वीडियो भारत में फुटबॉल के शुरुआती दौर से लेकर आधुनिक सफर के मुख्य मील के पत्थरों को संक्षिप्त रूप से समझने में मददगार है।

🇮🇳Indian Football History | भारत में फुटबॉल का पूरा इतिहास | 1911 से आज तक⚽| Indian Football #shorts Panjiyar Sports Academy · 205 views

यहाँ भारत में फुटबॉल के इतिहास और उसके विकास पर आधारित विशेषज्ञ लेख का दूसरा और अंतिम भाग (हिंदी में) प्रस्तुत है:

भारतीय फुटबॉल का स्वर्ण युग और संतोष ट्रॉफी

स्वतंत्रता के बाद के दशकों को भारतीय फुटबॉल का स्वर्ण युग माना जाता है। इस दौरान भारत ने एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन किया। साल 1951 के पहले एशियाई खेलों में भारत ने स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया, और फिर 1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में भी दक्षिण कोरिया को हराकर एक बार फिर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके अलावा, 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भारतीय टीम सेमीफाइनल तक पहुँचने वाली पहली एशियाई टीम बनी।

देशभर में इस खेल को और अधिक लोकप्रिय बनाने और स्थानीय प्रतिभाओं को निखारने के लिए संतोष ट्रॉफी (Santosh Trophy) की शुरुआत की गई। इस प्रतिष्ठित घरेलू टूर्नामेंट ने विभिन्न राज्यों और संघों के खिलाड़ियों को अपनी कला दिखाने का एक बड़ा मंच प्रदान किया। मोहन बागान, ईस्ट बंगाल और मोहम्दियन स्पोर्टिंग जैसे क्लबों की प्रतिद्वंद्विता ने बंगाल और पूरे देश में फुटबॉल प्रेमियों के दिलों में एक अलग ही रोमांच पैदा कर दिया।

आधुनिक दौर और भारतीय फुटबॉल का भविष्य

समय के साथ, भारतीय फुटबॉल ने कई उतार-चढ़ाव देखे। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रैंकिंग में गिरावट आई, लेकिन खेल के ढांचे में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया लगातार जारी रही। इंडियन सुपर लीग (ISL) की शुरुआत ने भारतीय फुटबॉल को एक बिल्कुल नया और पेशेवर मंच दिया है। आधुनिक स्टेडियम, उच्च गुणवत्ता वाली कोचिंग, और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की भागीदारी ने घरेलू फुटबॉल के स्तर को ऊंचा उठाया है।

आज, भारत में फुटबॉल केवल एक खेल नहीं, बल्कि एक संस्कृति बनता जा रहा है। युवा पीढ़ी यूरोपियन लीग्स को बड़े उत्साह से देखती है और देश में ग्रासरूट स्तर पर प्रशिक्षण अकादमियां तेजी से बढ़ रही हैं। कलकत्ता के मैदानों की ऐतिहासिक मिट्टी से शुरू हुआ यह सफर आज अत्याधुनिक स्टेडियमों तक पहुँच चुका है, जो इस बात का गवाही देता है कि भारत में फुटबॉल का भविष्य उज्ज्वल और प्रेरणादायक है।