रूस भारत का साथ क्यों देता है? (विशेष विश्लेषण - प्रथम भाग)

परिचय: दशकों पुरानी अटूट दोस्ती

भारत और रूस के बीच के संबंध अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उस अनूठी मिसाल की तरह हैं, जो समय की हर आंधी और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच चट्टान की तरह अडिग खड़े रहे हैं. जब भी यह सवाल उठता है कि "रूस भारत का साथ क्यों देता है?", तो इसका उत्तर केवल किसी एक तात्कालिक कूटनीतिक लाभ में नहीं, बल्कि इतिहास, आपसी भरोसे, रक्षात्मक जरूरतों और रणनीतिक संतुलन के एक लंबे सफर में छिपा है. शीत युद्ध के दौर से लेकर आज के बहुध्रुवीय (Multiplex) विश्व तक, दोनों देशों की दोस्ती ने हर कसौटी को पार किया है।

1. ऐतिहासिक और कूटनीतिक विश्वास (Historical Trust)

भारत और सोवियत संघ (तत्कालीन USSR, जिसका उत्तराधिकारी रूस है) के बीच संबंधों की नींव मजबूत सिद्धांतों पर रखी गई थी।

  • कठिन समय में मददगार: इतिहास गवाह है कि 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान जब पश्चिमी देश और अमेरिका भारत के खिलाफ खड़े थे, तब सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत का समर्थन किया और कूटनीतिक सुरक्षा कवच प्रदान किया।

  • दशकों का स्थायित्व: भारत के स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में जब देश को भारी उद्योगों, बुनियादी ढांचे और अंतरिक्ष कार्यक्रम के विकास के लिए तकनीकी व आर्थिक मदद की आवश्यकता थी, तब रूस (सोवियत संघ) ने बिना किसी शर्त के खुलकर भारत का हाथ थामा।

2. रक्षा और सामरिक आत्मनिर्भरता (Defense and Strategic Cooperation)

आज भी रूस भारत के सबसे बड़े और भरोसेमंद रक्षा साझीदारों में से एक है। भारत की सैन्य तैयारियों का एक बड़ा हिस्सा रूसी उपकरणों पर निर्भर करता है।

  • अत्याधुनिक सैन्य तकनीक: भारत को जितनी सहजता और उदारता से उन्नत रक्षा तकनीक, सुखोई लड़ाकू विमान, एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, और पनडुब्बियां रूस से मिलती हैं, वैसी तकनीक पश्चिमी देश आसानी से साझा नहीं करते।

  • संयुक्त उत्पादन: ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया जाना इस बात का प्रमाण है कि दोनों देश केवल खरीदार-विक्रेता के रिश्ते से आगे बढ़कर साझीदार हैं।

3. वैश्विक शक्ति संतुलन और भू-राजनीतिक अनिवार्यता

रूस के लिए भी भारत एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक साझीदार है। आज के वैश्विक परिदृश्य में रूस और भारत के हित कई मोर्चों पर एक-दूसरे के पूरक बनते हैं:

  • चीन के साथ संतुलन: पश्चिमी देशों के साथ रूस के बिगड़ते संबंधों के बाद मॉस्को के लिए बीजिंग (चीन) का महत्व बहुत बढ़ गया है। ऐसे में, रूस यह बिल्कुल नहीं चाहता कि वह पूरी तरह चीन पर आश्रित हो जाए। एशियाई भू-राजनीति में भारत एक ऐसा स्वतंत्र और सशक्त राष्ट्र है जो रूस को चीन के सामने रणनीतिक संतुलन और कूटनीतिक ऑक्सीजन प्रदान करता है।

  • बहुध्रुवीय विश्व की अवधारणा: भारत और रूस दोनों ही एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था के पक्षधर हैं जिसमें किसी एक देश या पश्चिमी गुट का एकाधिकार न हो, बल्कि कई ताकतें मिलकर दुनिया की दिशा तय करें। ब्रिक्स (BRICS) और एससीओ (SCO) जैसे मंचों पर दोनों देश मिलकर ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की आवाज को बुलंद करते हैं।

India-Russia Relations Explained

यह वीडियो पिछले सात दशकों में भारत और रूस के बीच विकसित हुई गहरी रणनीतिक साझेदारी और उसके ऐतिहासिक कारणों का विस्तार से विश्लेषण करता है।

India-Russia Relations Explained: 70 Years of Strategic Partnership | Full Analysis Vision IAS Hindi · 5.5K views

रूस भारत का साथ क्यों देता है? (अंतिम भाग)

भू-राजनीतिक संतुलन और बहुध्रुवीय विश्व का सपना

शीत युद्ध के दौर से लेकर आज की आधुनिक वैश्विक राजनीति तक, रूस और भारत के संबंध समय की हर कसौटी पर खरे उतरे हैं। रूस द्वारा निरंतर भारत का समर्थन किए जाने के पीछे केवल पुरानी कूटनीतिक औपचारिकताएं नहीं, बल्कि दोनों देशों के गहरे भू-राजनीतिक और सामरिक हित जुड़े हुए हैं। रूस यह अच्छी तरह समझता है कि एक 'बहुध्रुवीय विश्व' (Multipolar World) के निर्माण के लिए एशिया में एक मजबूत और स्वतंत्र भारत का होना अनिवार्य है। वैश्विक मंच पर अमेरिका के एकछत्र प्रभाव या किसी अन्य महाशक्ति के वर्चस्व को संतुलित करने के लिए रूस, भारत को एक सबसे भरोसेमंद और शक्तिशाली भागीदार के रूप में देखता है।

कूटनीतिक मंचों पर अटूट समर्थन

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सहित तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस ने हमेशा भारत के राष्ट्रीय हितों का दृढ़ता से पक्ष लिया है। कश्मीर जैसे संवेदनशील और आंतरिक मुद्दों पर जब भी पश्चिमी देशों या अन्य वैश्विक ताकतों की ओर से भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की गई, रूस ने एक मज़बूत ढाल बनकर हमेशा वीटो पावर (Veto Power) या कूटनीतिक बयानों के जरिए भारत का साथ दिया है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए रूस खुलकर और स्पष्ट रूप से अपनी प्रतिबद्धता जताता रहा है।

रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष सहयोग का मजबूत आधार

भारत आज भी अपनी रक्षा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा रूस से पूरा करता है। ब्रह्मोस जैसी अत्याधुनिक सुपरसोनिम मिसाइल प्रणाली का संयुक्त उत्पादन इस बात का प्रमाण है कि दोनों देश अब केवल 'खरीदार-विक्रेता' के रिश्ते से आगे बढ़कर सह-विकास और तकनीकी साझेदारी की ओर बढ़ चुके हैं। इसके अतिरिक्त, ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में रूस भारत के लिए कच्चे तेल और परमाणु ऊर्जा (जैसे कुडनकुलम परियोजना) का एक प्रमुख और विश्वसनीय स्रोत रहा है।

भविष्य की दिशा

वर्तमान वैश्विक उथल-पुथल और पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद, भारत और रूस ने अपनी 'विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी' को कमजोर नहीं होने दिया है। आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख, ब्रिक्स (BRICS) और एससीओ (SCO) जैसे मंचों पर आपसी तालमेल यह साबित करता है कि रूस और भारत का साथ केवल कूटनीतिक मजबूरी नहीं, बल्कि दोनों देशों की दीर्घकालिक संप्रभुता, सुरक्षा और पारस्परिक विश्वास का प्रतीक है।

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