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आज की भागती-दौड़ती दुनिया में जब हम पूछते हैं कि भारत के साथ कितने देश हैं, तो इसका सीधा जवाब किसी एक अंक में सिमटा हुआ नहीं है। असल में, संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से लगभग 140 से अधिक देश भारत को एक भरोसेमंद साझेदार मानते हैं। चाहे वह क्वाड हो या ब्रिक्स, भारत की आवाज आज हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंज रही है। यह महज कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति और रणनीतिक स्वायत्तता का परिणाम है जिसने दुनिया को झुकने पर मजबूर कर दिया है।
गुटनिरपेक्षता से विश्वमित्र तक: कूटनीतिक समीकरणों का बदलता स्वरूप
इतिहास के पन्नों को पलटें तो भारत की विदेश नीति हमेशा से 'वसुधैव कुटुंबकम' के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन हालिया वर्षों में इसमें एक आक्रामक स्पष्टता आई है। शीत युद्ध के दौर में हम एक तरफ खड़े होने से कतराते थे, पर आज का भारत अपनी शर्तों पर दोस्ती करता है। रूस के साथ हमारी दशकों पुरानी रक्षा साझेदारी आज भी उतनी ही अटूट है, जितनी पहले थी, बावजूद इसके कि पश्चिमी देशों ने यूक्रेन संकट के दौरान काफी दबाव बनाया। यहाँ भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' काम आती है। हम रूस से तेल भी खरीदते हैं और अमेरिका के साथ 'क्रिटिकल टेक्नोलॉजी' पर समझौते भी करते हैं। यह दोधारी कूटनीति ही भारत की असली ताकत है।
दक्षिण एशिया में 'नेबरहुड फर्स्ट' नीति के तहत भूटान, श्रीलंका और मॉरीशस जैसे देश हमारे अभेद्य किले की तरह हैं। वहीं, मध्य पूर्व में सऊदी अरब और यूएई के साथ भारत के संबंध अब सिर्फ श्रम और तेल तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे अब भारत के सबसे बड़े निवेशकों में शुमार हैं। इजराइल के साथ हमारी तकनीकी और रक्षा सांठगांठ जगजाहिर है, जो यह दर्शाती है कि भारत अब विचारधाराओं के चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के तराजू पर तौलकर अपने दोस्त चुनता है। इस नए भारत ने 'जीरो सम गेम' को ठुकराकर बहुध्रुवीय विश्व की नींव रख दी है, जहाँ हर बड़ा देश भारत की मेज पर बैठने को बेताब है।
शक्ति संतुलन की धुरी: वैश्विक मंच पर भारत का अटूट समर्थन
जब हम वैश्विक समर्थन का विश्लेषण करते हैं, तो हमें 'वोटिंग पैटर्न' और 'क्राइसिस मैनेजमेंट' को समझना होगा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के मुद्दे पर फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और अमेरिका जैसे पी-5 देश (चीन को छोड़कर) खुलकर भारत का नाम लेते हैं। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। भारत आज ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की निर्विवाद आवाज बन चुका है। अफ्रीका के 54 देशों में भारत का प्रभाव चीन के 'डेब्ट ट्रैप' के मुकाबले कहीं अधिक मानवीय और टिकाऊ है। हमने कोरोना काल में 'वैक्सीन मैत्री' के जरिए जो सद्भावना कमाई, वह आज अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भारत के लिए एक सुरक्षा कवच का काम कर रही है।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की स्थिति अब एक 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' की हो गई है। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत को चीन के विस्तारवाद के खिलाफ एक अनिवार्य ढाल मानते हैं। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि भारत के समर्थन का दायरा सिर्फ सरकारी स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि 'डायस्पोरा' यानी विदेशों में बसे भारतीयों ने भी स्थानीय राजनीति पर गहरी पकड़ बनाई है। अमेरिका और कनाडा जैसे देशों की आंतरिक राजनीति में भारतीय समुदाय का रसूख भारत के प्रति वहाँ की सरकारों के नजरिए को नरम रखने पर मजबूर करता है। भारत अब
भारत के समर्थन को समझने में होने वाली सामान्य गलतियाँ और विशेषज्ञ सुझाव
अक्सर लोग द्विपक्षीय संबंधों को केवल 'दोस्त' या 'दुश्मन' के चश्मे से देखते हैं, जो एक बड़ी रणनीतिक भूल है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी समर्थन स्थायी या बिना शर्त नहीं होता। विशेषज्ञ मानते हैं कि सबसे बड़ी गलती यह मान लेना है कि एक देश अगर किसी एक मुद्दे पर भारत के साथ है, तो वह हर मुद्दे पर साथ होगा। उदाहरण के लिए, रूस रक्षा और ऊर्जा में भारत का अटूट साझेदार है, लेकिन चीन के साथ उसके अपने समीकरण भारत से अलग हो सकते हैं।
विशेषज्ञ सुझाव: भारत की वैश्विक शक्ति का आकलन करने के लिए केवल बयानों पर नहीं, बल्कि वोटिंग पैटर्न (UN में), व्यापारिक समझौतों और सैन्य अभ्यासों पर ध्यान दें। आज के समय में भारत 'बहु-पक्षीय संरेखण' (Multi-alignment) की नीति पर चल रहा है। इसका मतलब है कि भारत एक ही समय में अमेरिका के साथ QUAD में शामिल हो सकता है और रूस-चीन के साथ BRICS का हिस्सा भी बना रह सकता है। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी देश के समर्थन को केवल सोशल मीडिया ट्रेंड्स के आधार पर न मापें, बल्कि उस देश की आर्थिक निर्भरता और भू-राजनीतिक मजबूरियों का विश्लेषण करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या संयुक्त राष्ट्र (UN) के सभी सदस्य देश भारत के समर्थक हैं?
संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से अधिकांश के साथ भारत के सौहार्दपूर्ण संबंध हैं। हालांकि, आतंकवाद और कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान और तुर्की जैसे कुछ देश अक्सर विपरीत रुख अपनाते हैं। वहीं, 120 से अधिक देश 'गुटनिरपेक्ष आंदोलन' (NAM) के माध्यम से भारत के नेतृत्व को स्वीकार करते हैं।
2. रूस और अमेरिका में से भारत का सबसे बड़ा समर्थक कौन है?
यह इस पर निर्भर करता है कि संदर्भ क्या है। रूस ऐतिहासिक रूप से भारत का सबसे पुराना रणनीतिक और सैन्य सहयोगी रहा है जिसने वीटो पावर के माध्यम से कई बार भारत का साथ दिया है। दूसरी ओर, अमेरिका वर्तमान में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है और तकनीक व हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा में महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान करता है। भारत दोनों के साथ संतुलन बनाकर चलता है।
3. क्या भारत को सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिए समर्थन प्राप्त है?
हाँ, सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से चार—अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन—ने आधिकारिक तौर पर भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। केवल चीन ही एकमात्र ऐसा देश है जो तकनीकी आधार पर इसमें अड़ंगा लगाता रहा है। इसके अलावा, जी-4 समूह के देश भी भारत के दावे का पुरजोर समर्थन करते हैं।
संपादकीय निष्कर्ष (Editorial Verdict)
भारत की वर्तमान स्थिति एक 'वैश्विक मित्र' (Vishwa Mitra) की है। आज भारत के समर्थन में देशों की संख्या केवल भावनात्मक जुड़ाव पर नहीं, बल्कि भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था और विशाल बाजार पर टिकी है। मेरा मानना है कि भारत की असली ताकत उसकी स्वतंत्र विदेश नीति है, जो उसे किसी एक गुट का पिछलग्गू बनने के बजाय अपनी शर्तों पर वैश्विक समर्थन जुटाने की शक्ति देती है। भविष्य में भारत का समर्थन और बढ़ेगा, क्योंकि दुनिया को अब एक स्थिर और जिम्मेदार लोकतांत्रिक शक्ति की आवश्यकता है।
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