भारतीय संगीत के १० ठाट: रागों का मूल आधार
भारतीय शास्त्रीय संगीत में ठाट (या थाट) का एक विशेष और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सरल शब्दों में कहें तो ठाट स्वरों का वह समूह है जिससे विभिन्न रागों की उत्पत्ति होती है। उत्तर भारतीय (हिंदुस्तानी) संगीत पद्धति में पंडित विष्णु नारायण भातखंडे जी ने संगीत को एक सुव्यवस्थित रूप देने के लिए मुख्य रूप से १० ठाटों का वर्गीकरण किया था।
ये दस ठाट शास्त्रीय संगीत के संपूर्ण ताने-बाने को आधार प्रदान करते हैं:
१. कल्याण ठाट: इसमें तीव्र 'म' का प्रयोग होता है और यह शाम के समय गाए जाने वाले रागों का आधार है।
२. बिलावल ठाट: इस ठाट में सभी स्वर 'शुद्ध' प्रयोग किए जाते हैं।
३. खमाज ठाट: इसमें कोमल 'नि' का प्रयोग होता है, जो इसे एक मधुर रूप देता है।
४. काफी ठाट: इस ठाट में 'ग' और 'नि' स्वर कोमल होते हैं।
५. असावरी ठाट: इसमें 'ग', 'ध' और 'नि' स्वर कोमल प्रयोग किए जाते हैं।
६. भैरव ठाट: इसमें 'रे' और 'ध' कोमल होते हैं, जो सुबह की गंभीरता को दर्शाते हैं।
७. भैरवी ठाट: इसे 'सदासुहागिन ठाट' भी कहा जाता है क्योंकि इसमें 'रे', 'ग', 'ध', और 'नि' चारों स्वर कोमल होते हैं।
८. पूर्वी ठाट: इसमें कोमल 'रे', कोमल 'ध' और तीव्र 'म' का संयोजन होता है।
९. मारवा ठाट: इस ठाट में कोमल 'रे' और तीव्र 'म' का प्रयोग किया जाता है।
१०. तोड़ी ठाट: इसमें कोमल 'रे', कोमल 'ग', कोमल 'ध' और तीव्र 'म' का प्रयोग होता है।
ये सभी ठाट संगीत साधकों के लिए गायन और वादन की नींव की तरह काम करते हैं। इन्हीं के आधार पर सैकड़ों मनमोहक रागों की रचना संभव हो पाई है।
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