भालू की पूँछ की कहानी
एक बार की बात है, जब भालू की भी चमकीली और लंबी पूँछ हुआ करती थी। सभी जंगलवासी उसकी पूँछ की तारीफ करते। लेकिन एक दिन, चालाक लोमड़ी ने भालू के दिमाग में कुछ बातें भर दीं। उसने कहा कि अगर वह अपनी पूँछ से झील में छेड़छाड़ करे, तो मछलियाँ अपने आप उसके हाथ आ जाएँगी। भालू ने लोमड़ी की बात मान ली और ठंडी झील में पूँछ डाल दी।
रात भर उसने इंतज़ार किया, लेकिन मछली के बजाय बर्फ जम गई। सुबह जब वह पूँछ खींची, तो वह टूटकर छोटी हो चुकी थी। तब से भालू की पूँछ छोटी और बेमानी रहती है।
कहानी से सबक यह मिलता है कि बिना सोचे-समझे किसी की बात में आना अक्सर मुसीबत खड़ी कर देता है। भालू ने केवल इसलिए अपनी पूँछ गँवा दी, क्योंकि उसने लोमड़ी की बात पर भरोसा कर लिया। यदि वह अपने दिल की सुनता और ज़रूरत से ज़्यादा शर्तों में उलझता नहीं, तो शायद आज भी उसकी पूँछ वैसी ही होती जैसे बाघ या भेड़िये क
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।