अकबर और महाराणा प्रताप के बीच संधि के प्रयास
जब महाराणा प्रताप ने सन् 1572 में मेवाड़ की गद्दी संभाली, तो मुगल बादशाह अकबर के लिए यह स्वीकार्य नहीं था कि राजपूताने का कोई राजा उसके साम्राज्य में शामिल होने से इनकार करे। अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप मुगल साम्राज्य में सहयोगी के रूप में शामिल हों और उसकी सरकार में स्थान पाएं।
इसी कारण अकबर ने संधि की कोशिश के तहत जलाल खान कोरची को महाराणा प्रताप के पास दूत के रूप में भेजा। जलाल खान कोरची को बहुत मीठी भाषा बोलने वाला और समझदार व्यक्ति माना जाता था। अकबर का मानना था कि वह शांति और सहयोग का संदेश पहुंचाकर महाराणा को मुगल दरबार से जोड़ सकता है। यह दूत भेजा गया था सितंबर 1572 में, जो महाराणा के राज्याभिषेक के महज छह महीने बाद की बात है।
लेकिन महाराणा प्रताप ने आजादी की कीमत को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने अकबर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और स्वतंत्र रहने का फैसला किया। यह निर्णय ऐतिहासिक साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद हल्दीघ
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