सत्य: एक है या अनेक?
सत्य के स्वभाव को समझने की खोज में मनुष्य आज भी उतना ही उलझा हुआ है, जितना प्राचीन काल में था। एक ओर तर्क बोलता है कि सत्य एक होना चाहिए—अखंड, अटूट। दूसरी ओर अनुभव दिखाता है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सत्य अलग-अलग रूप लेता है—विज्ञान में, आध्यात्मिकता में, नैतिकता में, संबंधों में।
लेकिन क्या सत्य वास्तव में एक है या अनेक? कुछ विचारकों का मानना है कि सत्य सभी खोजों में सफलता का मापदंड बनकर प्रकट होता है। जहाँ तक वैज्ञानिक प्रयोग का सवाल है, सत्य वह है जो परीक्षण में टिके। जहाँ भावनाओं की बात है, सत्य वही है जो हृदय को छू जाए।
इसीलिए कहा जाता है—सत्य न तो केवल एक है, न ही सिर्फ अनेक। न तो वह केवल एक सरल एकता है और न ही जटिल बहुलता। वह दोनों के पार है। जैसे एक दीपक से अनेक दीपक जल सकते हैं, फिर भी प्रकाश का स्रोत एक ही माना जाता है।
हमारी जिंदगी में सत्य कई रंगों में उमड़ता है—कभी तर्क के रूप में, कभ
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