गीता के अनुसार शरीर क्या है?
गीता में शरीर को एक रथ की उपमा देकर समझाया गया है। इस दृष्टांत के अनुसार, शरीर वही रथ है जिसमें हम संसार की यात्रा करते हैं। इन्द्रियाँ उस रथ के घोड़े हैं, जो दिशा बदलते रहते हैं। मन सारथी का काम करता है, जो लगाम संभालता है। और जो वास्तविक स्वामी है, वह है आत्मा—वह अमर तत्व जो इस सारे जीवन-रथ का असली यात्री है।
शरीर अपने आप में मूक और निष्क्रिय है। वह तभी चलता है, जब मन उसे निर्देश देता है। यही कारण है कि गीता कहती है कि मन ही सब कुछ नियंत्रित करता है। जैसे घोड़े सारथी के हाथों में लगाम देखकर चलते हैं, वैसे ही शरीर भी मन के आदेश पर चलता है। अगर मन शुद्ध और नियंत्रित है, तो शरीर भी धर्म के मार्ग पर बढ़ता है। पर अगर मन अशांत या विक्षिप्त है, तो शरीर भी भटक जाता है।
यह ज्ञान न केवल दार्शनिक है, बल्कि जीवन के लिए गहरा मार्गदर्शन भी है। गीता सिखाती है कि शरीर की नहीं, मन की शुद्धि पर ध्यान
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